भारतीय संस्कृति में बचपन में एक संस्कार हम स्वतः ही सीखते हैं, की सुबह बिस्तर से उतरते समय धरती पर पैर रखने से पहले एक श्लोक बोलना चाहिए। "समुद्रवसने देवि, पर्वतस्तनमण्डले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं, पादस्पर्शं क्षमस्व मे"। इसका अर्थ समझ आए या ना आए पर एक बात मन में बैठ जाति है की पृथ्वी माँ स्वरूप है। इनपर पैर रखने से पूर्व क्षमा माँगनी चाहिए। 

प्रश्न यहाँ यह है की धरती माँ क्यूँ है? धरती माँ इसलिए है क्यूँकि माँ की तरह ही यह हमारा लालन पालन करती है। यह पंच भूतों में से एक है जो हमें स्थिरता व आकार प्रदान करती है। 

आज जब जलवायु सम्मेलनों की बहसें सुनता हूँ, कार्बन क्रेडिट के सौदे देखता हूँ, तो वही श्लोक याद आता है। और सोचता हूँ। जो सभ्यता धरती पर पैर रखने से पहले क्षमा माँगती थी, वह आज किससे पर्यावरण सीख रही है? उनसे, जिन्होंने पहले धरती को लूटा और अब लूट का लाइसेंस बेच रहे हैं?

अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त हजारों वर्ष पहले घोषणा कर चुका है। माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः। भूमि माता है, मैं उसका पुत्र हूँ। यह कविता नहीं है। यह नीति वाक्य है। और मेरा तर्क है कि यही एक वाक्य आज की पूरी पर्यावरण नीति की नींव बन सकता है। बशर्ते हम इसे एकात्म मानव दर्शन की दृष्टि से समझें और जीवनशैली में उतारें।

दो दृष्टियाँ: पुत्र और विजेता

पश्चिमी औद्योगिक चिंतन में मनुष्य प्रकृति का विजेता है। धरती संसाधनों का गोदाम है। जंगल टिम्बर है। नदी जल-आपूर्ति है। पहाड़ खनिज भंडार है। इस दृष्टि ने तीन सौ वर्षों में वह किया जो पिछली तीन सहस्राब्दियों में नहीं हुआ था। हवा जहरीली, नदियाँ मैली, धरती बुखार में।

भारतीय दृष्टि में मनुष्य पुत्र है। और पुत्र माँ का शोषण नहीं करता। सेवा करता है। इसीलिए हमारे यहाँ नदियाँ देवियाँ थीं। पर्वत देवताओं के निवास थे। वृक्ष पूजनीय थे। यह अंधविश्वास नहीं था। यह पीढ़ियों तक अनुपालन सुनिश्चित करने वाला विवेकपूर्ण तंत्र था। श्रद्धा के आवरण में लिपटा हुआ संसाधन प्रबंधन।

पर यहाँ एक असुविधाजनक प्रश्न पूछना होगा। क्या आज के भारत में इस मंत्र का प्रयोजन पूरा हो रहा है? यमुना का झाग देखिए। महानगरों की धुंध देखिए। उत्तर स्पष्ट है। नहीं। हमने नदी की आरती को तो बचा लिया, पर उसमें गिरने वाले नाले को धर्मनिरपेक्ष घोषित कर दिया। मंत्र कंठ में है, आचरण में नहीं। पूजा कर्मकांड बन गई, संबंध टूट गया।

कार्बन क्रेडिट: पाप खरीदने का बाज़ार

टूटे संबंध की जगह पश्चिम ने हमें एक सौदा थमाया है। कार्बन क्रेडिट। इसका तर्क सुनिए। आप प्रदूषण करते रहिए, बस कहीं और पेड़ लगाने की फीस भर दीजिए। अमीर देश और कंपनियाँ प्रदूषण का अधिकार खरीद लेती हैं। धरती का विनाश शेयर बाज़ार में एक तिजारती उत्पाद बन जाता है।

यह वैसा ही है जैसे कोई कहे कि मैं झूठ बोलता रहूँगा, बदले में हर महीने सत्यनारायण की कथा करा दूँगा। पाप की भरपाई शुल्क से नहीं होती। आचरण बदलने से होती है।

और आँकड़े गवाह हैं। कार्बन बाज़ार बढ़ते गए, उत्सर्जन भी बढ़ता गया। क्यों? क्योंकि यह पूरा ढाँचा लक्षण का इलाज करता है, रोग का नहीं। लक्षण है उत्सर्जन। रोग है अमर्यादित उपभोग। जब तक उपभोग की भूख धर्म से नियंत्रित नहीं होगी, तब तक बाज़ार के औज़ार खाता-बही ही बदलेंगे, धरती का बुखार नहीं।

स्वतंत्रता के बाद हमारे नीति नियोजकों ने यही आयातित चश्मा पहन लिया। पहले विकास का पश्चिमी मॉडल अपनाया, अब पर्यावरण का पश्चिमी मॉडल अपना रहे हैं। दोनों में प्रकृति वस्तु है। हम एक आध्यात्मिक संकट को आर्थिक औज़ारों से सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। यह नहीं हो सकता।

प्राचीन भारत की पारिस्थितिकी: श्रद्धा में छिपा विज्ञान

अब देखिए कि हमारे पूर्वजों ने यह प्रबंधन कैसे किया था। अंतरराष्ट्रीय संधियों से नहीं। विकेंद्रित, समुदाय-चालित श्रद्धा से।

पंच महाभूत की अवधारणा लीजिए। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश। समस्त भौतिक अस्तित्व का आधार। इनमें से किसी को दूषित करना अपने ही विरुद्ध पाप माना गया। यह पर्यावरण कानून का सबसे संक्षिप्त रूप है। पाँच तत्व, एक निषेध।

देवराई और कावु की परंपरा लीजिए। पवित्र वन। वहाँ से एक टहनी तोड़ना भी वर्जित था। आधुनिक जीव विज्ञान को जैव विविधता और जीन पूल का महत्व समझने में बीसवीं सदी लग गई। हमारे गाँवों ने वही काम देवता के नाम पर सदियों पहले कर दिखाया।

कृषि यज्ञ थी। किसान मिट्टी के सूक्ष्म जीवों के साथ साझेदारी करता था। जीवामृत जैसे जैविक इनपुट थे, रसायनों से माँ को ज़हर देना नहीं। और गाय? वह केवल आस्था नहीं थी। वह कृषि अर्थव्यवस्था की धुरी थी। खाद, ईंधन, पोषण, सब बिना किसी औद्योगिक प्रसंस्करण के।

जीवित प्रमाण: बिश्नोई से जीवित पुलों तक

यह दर्शन केवल ग्रंथों में नहीं रहा। इसके लिए प्राण दिए गए हैं।

वर्ष 1730। राजस्थान। राजा के सैनिक खेजड़ी के वृक्ष काटने आए। अमृता देवी बिश्नोई आगे आईं। कहा, सिर कटे तो कटे, वृक्ष नहीं कटेगा। सर साटे रूख रहे तो भी सस्तो जाण। उस दिन 363 बिश्नोइयों ने वृक्षों से लिपटकर बलिदान दिया। यह activism नहीं था। यह पुत्र का माँ के लिए बलिदान था। माता भूमिः का जीवंत रूप।

1970 के दशक का चिपको आंदोलन इसी परंपरा की अगली कड़ी था। गढ़वाल की महिलाएँ पश्चिमी environmentalism की नकल नहीं कर रही थीं। वे वन के प्रति अपने पारंपरिक अधिकार और कर्तव्य की बात कर रही थीं।

और मेघालय देखिए। खासी और जयंतिया जनजातियों ने नदियाँ पार करने के लिए कंक्रीट के पुल नहीं बनाए। उन्होंने रबर के वृक्ष की जड़ों को दशकों तक धैर्य से गूँथकर जीवित पुल बनाए। प्रकृति को तोड़ा नहीं, मनाया। यह दीर्घकालिक सामंजस्य की पराकाष्ठा है।

एकात्म मानव दर्शन: दोहन और शोषण का भेद

इस पूरी विरासत को आधुनिक नीति में ढालने का दार्शनिक आधार पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन देता है। उन्होंने पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों की एक ही चूक पकड़ी थी। दोनों मनुष्य और प्रकृति को अलग और परस्पर विरोधी मानते हैं। एक बाज़ार के लिए लड़ता है, दूसरा वर्ग के लिए। धरती दोनों की लड़ाई में कच्चा माल है।

एकात्म मानव दर्शन कहता है कि व्यक्ति, समाज, सृष्टि और परमेष्ठी में जैविक एकता है। और यहीं दीनदयाल जी का वह सूत्र आता है जो पूरी बहस को निपटा देता है। प्रकृति का दोहन करो, शोषण नहीं। दोहन यानी गाय के दूध की तरह, बछड़े का हिस्सा छोड़कर, उतना लेना जितना प्रकृति फिर भर सके। शोषण यानी लोभ से चलने वाला विनाश।

अब इस कसौटी पर कार्बन क्रेडिट को परखिए। वह शोषण जारी रखने की व्यवस्था है, दोहन की मर्यादा नहीं। इसीलिए वह असफल है।

और अंत्योदय को भी इसी में जोड़िए। अंतिम व्यक्ति का उदय तभी संभव है जब वह पर्यावरण बचे जिस पर वह निर्भर है। नदी मरती है तो सबसे पहले मछुआरा मरता है। जंगल कटता है तो सबसे पहले वनवासी उजड़ता है। पर्यावरण की रक्षा गरीब की रक्षा है। यह विलासिता नहीं, अंत्योदय है।

हिसाब सामने रखिए

पश्चिम हमें उपदेश देता है। पर प्रति व्यक्ति कार्बन पदचिह्न देखिए। औसत अमेरिकी का उत्सर्जन औसत भारतीय से कई गुना अधिक है। उपदेश वे दे रहे हैं, समाधान हम जी रहे हैं।

रोज़ की चार चीज़ें ही देख लीजिए। उनके यहाँ एक बार इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक, हमारे यहाँ पीतल और मिट्टी के बर्तन जो पीढ़ियों चलते हैं। उनके यहाँ फास्ट फैशन का सिंथेटिक कपड़ा, हमारे यहाँ खादी और सूती जो धरती में लौट जाते हैं। उनका पशु-प्रोटीन प्रधान भोजन जो पानी पी जाता है, हमारा शाकाहार जो हल्का है। उनकी एयर कंडीशनर पर टिकी इमारतें, हमारी आँगन और मोटी दीवारों वाली वास्तुकला जो बिना बिजली के ठंडी रहती थी।

भारतीय मितव्ययिता कोई पिछड़ापन नहीं है। वह चलता-फिरता जलवायु समाधान है। Mission LiFE जैसी पहल इसी दिशा में सही कदम है, बशर्ते वह नारे से आगे बढ़कर नीति के हर विभाग में उतरे।

नीति की दिशा: जीवनशैली पर्यावरणवाद

तो करना क्या है? सूत्र एक है। जीवनशैली पर्यावरणवाद। संस्कार और संयम को नीति का केंद्र बनाना। कुछ ठोस दिशाएँ।

पहली, शहर ऐसे बनें जो साँस लें। वर्नाक्युलर वास्तुकला, जल संरचनाओं का पुनर्जीवन, हर मोहल्ले में देवराई की तर्ज पर अभयारण्य खंड।

दूसरी, कृषि यज्ञ की ओर लौटे। जैविक और गौ-आधारित खेती को वही प्रोत्साहन मिले जो रासायनिक इनपुट को मिलता रहा है।

तीसरी, पुनः उपयोग की संस्कृति को कर प्रणाली में स्थान मिले। टिकाऊ बर्तन, खादी, मरम्मत सेवाओं पर छूट। डिस्पोजेबल संस्कृति पर भार।

चौथी, शिक्षा में पृथ्वी सूक्त पढ़ाया जाए। पर्यावरण विज्ञान की किताब में बिश्नोई बलिदान और जीवित पुल भी हों, केवल संधियों के नाम नहीं।

और हर नीति एक कसौटी से गुजरे। क्या यह दोहन है या शोषण? बछड़े का हिस्सा बच रहा है या नहीं?

निष्कर्ष: बाज़ार नहीं, माँ

आधुनिक पर्यावरण संकट अपने मूल में चेतना का संकट है। पश्चिम उसे तकनीक और बाज़ार से सुलझाना चाहता है। भारत जानता है कि समाधान संस्कार और संयम में है।

माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः अतीत का अवशेष नहीं है। यह मानवता के पास उपलब्ध सबसे भविष्योन्मुखी नीति वाक्य है। हमें पश्चिम के अपराधबोध की राजनीति और कार्बन क्रेडिट के खोखलेपन, दोनों को अस्वीकार करना होगा। और दुनिया को वह बात कहनी होगी जो हमारा बच्चा सुबह बिस्तर से उतरते हुए सीखता था।

धरती बाज़ार नहीं है। धरती माँ है। और माँ से रिश्ता खरीदा नहीं जाता। निभाया जाता है।