हमारे बारे में (About Us)
'एकात्म वाणी'
(Ekatmvani) एक विशिष्ट वैचारिक और विश्लेषणात्मक
समाचार पोर्टल है। हमारा उद्देश्य समसामयिक राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय समाचारों और सरकारी नीतियों का केवल
रिपोर्ट करना नहीं है, बल्कि उनका एक गहरा वैचारिक विश्लेषण करना है।
हम हर नीति और घटना को पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी द्वारा
प्रतिपादित 'एकात्म मानव दर्शन' (Integral Humanism) के चश्मे से देखते और परखते हैं।
हमारा प्रयास यह विश्लेषण करना है कि वर्तमान घटनाक्रम इस शाश्वत दर्शन के कितने
करीब है या उससे कितना दूर है।
इस वैचारिक विवेचना के लिए हम उन
वरिष्ठ लेखकों, विचारकों
और विशेषज्ञों से गहन विचार-विमर्श करते हैं जिन्होंने पंडित दीनदयाल जी के जीवन
और दर्शन का गहराई से अध्ययन किया है। उन्हीं चर्चाओं के आधार पर इस पोर्टल की
सामग्री तैयार की जाती है।
एकात्म मानव दर्शन: एक समग्र जीवन शैली
हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि यदि 'एकात्म मानव दर्शन' का इसके पूर्ण और मूल स्वरूप में
अनुसरण किया जाए, तो वही
सच्चे अर्थों में 'रामराज्य' की स्थापना है।
- परस्पर संबंध: यह एक ऐसी अवस्था है जहाँ व्यक्ति अपने परिवार, अपने समाज, अपनी प्रकृति (सृष्टि) और ईश्वर—इन सभी के बीच के संबंधों को पूर्ण रूप से समझता है और उसी के अनुरूप अपना जीवन जीता है।
- सह-अस्तित्व: इस दर्शन में व्यक्ति, समाज और सृष्टि एक-दूसरे के लिए प्रतिबंधक या बाधक नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के विकास में सहायक हैं।
- समन्वय, न कि प्रतिस्पर्धा: हमारी राजनीति, हमारे उद्योग, हमारा परिवार, हमारा समाज और हमारी संस्कृति परस्पर सहयोग के साथ जिएं। यहाँ अंधी प्रतिस्पर्धा (Competition) का कोई स्थान नहीं है, बल्कि सह-जीवन, सह-अस्तित्व और निरंतरता है।
- संसाधनों की मर्यादा: जहाँ विचारों की खुली उपलब्धता हो, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन न किया जाए। हर कार्य और हर वस्तु के उपभोग में एक मर्यादा का पालन हो।
हमारा उद्देश्य: एक स्वस्थ वैचारिक मंथन
'एकात्म वाणी' की स्थापना समाज में एक सकारात्मक और बौद्धिक बहस (Debate) को जन्म देने के लिए की गई है। यह एक ऐसा मंच है जहाँ आप आकर लेखों को पढ़ें, उन पर गहरा चिंतन करें और अपने विचार व्यक्त करें। हमारा मानना है कि श्रेष्ठ विचारों के प्रवाह से ही एक श्रेष्ठ समाज और व्यवस्था को स्थापित किया जा सकता है।
मुख्य संपादक: श्री सौरभ मिश्रा
'एकात्म वाणी' का नेतृत्व इसके मुख्य संपादक श्री सौरभ मिश्रा जी कर रहे हैं। उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के सिद्धांतों को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उद्योगों (Industries)में उनका व्यावहारिक प्रयोग किया और उसमें अभूतपूर्व सफलता भी प्राप्त की है।
श्री मिश्रा जी का मानना है कि—जैसा कि स्वयं पंडित दीनदयाल जी कहते थे—'एकात्म मानव दर्शन' भारत का मूल दर्शन है। यह कोई नया गढ़ा गया 'वाद' (Ism) नहीं है। दीनदयाल जी ने इसमें कुछ भी नया नहीं बताया था, बल्कि यह वह सनातन ज्ञान है जो युगों से हमारे गांवों, हमारे शहरों और हमारी जीवनशैली में सहज रूप से उपलब्ध है। बस आवश्यकता उस मूल रूप को पुनः पहचानने की है।
भारत: एक सांस्कृतिक राष्ट्र
'एकात्म वाणी' के माध्यम से हम यह संदेश स्पष्ट करना चाहते हैं कि भारत न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि सांस्कृतिक स्तर पर भी पूर्णतः'आत्मनिर्भर' बने।
भारत मूल रूप से एक सांस्कृतिक राष्ट्र है, न कि कोई धार्मिक राष्ट्र। भारत कभी भी एक धार्मिक राष्ट्र नहीं रहा। इस पुण्यभूमि की विशेषता ही यही है कि यहाँ सभी धर्म और पंथ अपने सहज तत्वों के साथ, एक-दूसरे के साथ मिलकर आगे बढ़ते हैं। इसी मूल और समावेशी अवधारणा को समाज के सामने रखना ही हमारा अंतिम लक्ष्य है।
आइए, 'एकात्म वाणी' के इस वैचारिक अनुष्ठान में हमारे साथ जुड़ें, पढ़ें, विचार करें और राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दें।
एकात्म वाणी: हमारे लोगो और टैगलाइन का अर्थ "श्री रामस्य राज्यम्"
यह केवल एक टैगलाइन नहीं है। यह एक संकल्प है। यह एक दृष्टि है। और सबसे महत्वपूर्ण - यह एक प्रश्न है जो हम स्वयं से प्रतिदिन पूछते हैं: क्या हम उस दिशा में जा रहे हैं?
एकात्म वाणी न्यूज़ पोर्टल का यह आधिकारिक लोगो और टैगलाइन उस आदर्श का प्रतीक है जिसे पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने एकात्म मानव दर्शन में प्रतिपादित किया था। हमारा यह दृढ़ मत है कि यदि एकात्म मानव दर्शन अपने पूर्ण सांस्कृतिक,सामाजिक और व्यावहारिक रूप में भारतीय जनजीवन में पुनः स्थापित हो जाए - तो वह आदर्श अवस्था ही 'श्री राम का राज्य' है।
'राम राज्य' क्या है? - एक आवश्यक स्पष्टीकरण
जब हम 'राम राज्य' की बात करते हैं, तो इस शब्द के साथ कई भ्रांतियाँ जुड़ी हुई हैं। इसलिए सबसे पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि एकात्म वाणी के संदर्भ में 'राम राज्य'का अर्थ किसी साम्प्रदायिक, धार्मिक या राजनीतिक 'हिन्दू राष्ट्र' से बिल्कुल नहीं है।
'राम'केवल एक नाम नहीं है। 'राम' एक गुण है, एक मर्यादा है,एक आचरण है। महर्षि वाल्मीकि ने जब राम को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' कहा, तो उनका अभिप्राय यह था कि राम वह व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने जीवन में धर्म,समाज और प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों को सर्वोच्च स्थान दिया - अपने व्यक्तिगत सुख से भी ऊपर। इसीलिए राम राज्य किसी एक धर्म का राज्य नहीं, बल्कि उस आदर्श व्यवस्था का नाम है जहाँ व्यक्ति, समाज और प्रकृति - तीनों अपने सर्वोत्तम स्वरूप में एक साथ फलते-फूलते हैं。
महात्मा गाँधी ने भी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 'राम राज्य' की कल्पना इसी अर्थ में की थी - एक ऐसा भारत जहाँ न कोई शोषक हो, न कोई शोषित। जहाँ न्याय सबको मिले और प्रकृति का सम्मान हो। पंडित दीनदयाल जी ने इसी विचार को एकात्म मानव दर्शन के माध्यम से एक व्यवस्थित दार्शनिक आधार दिया।
एकात्म वाणी इसी विचार को अपने समाचार, अपने विश्लेषण और अपनी पत्रकारिता का केंद्र बनाती है।
राम राज्य के तीन स्तंभ
एकात्म वाणी के दर्शन में राम राज्य तीन मुख्य स्तंभों पर टिका है -
1. पहला स्तंभ: मर्यादित व्यक्ति और व्यक्तिगत श्रेष्ठता
राम राज्य की नींव व्यक्ति से शुरू होती है। परन्तु यह वह व्यक्ति नहीं है जिसे पश्चिमी दर्शन ने गढ़ा है - वह व्यक्ति जो केवल अपने लाभ के लिए जीता है, जो संसाधनों को अपनी असीमित इच्छाओं के लिए दोहन करता है। राम राज्य का व्यक्ति 'मर्यादित'है। 'मर्यादा'का अर्थ बंधन नहीं है। मर्यादा का अर्थ है - एक ऐसी सीमा रेखा जो व्यक्ति स्वयं अपने विवेक से खींचता है। जो उसे बताती है कि मेरी स्वतंत्रता वहाँ समाप्त होती है,जहाँ दूसरे का अधिकार शुरू होता है। जो उसे सिखाती है कि प्रकृति से उतना ही लेना है,जितने की वास्तविक आवश्यकता है।
इस मर्यादित व्यक्ति का लक्ष्य केवल धनार्जन नहीं होता। उसका लक्ष्य होता है - अपने प्रत्येक कार्य को,अपने प्रत्येक उत्पाद को, अपनी प्रत्येक सेवा को गुणवत्ता के उच्चतम स्तर तक ले जाना। वह अपने काम को केवल आजीविका नहीं,बल्कि एक साधना मानता है। वह जानता है कि उसका कार्य केवल उसके परिवार के लिए नहीं,बल्कि उस समाज के लिए भी है जिसने उसे यह अवसर दिया。
ऐसे व्यक्ति की 'व्यक्तिगत श्रेष्ठता' किसी पुरस्कार से नहीं नापी जाती। वह उसके आचरण में, उसके उत्पाद की गुणवत्ता में और उसके व्यवहार की सच्चाई में दिखती है। राम राज्य में हर व्यक्ति - चाहे वह किसान हो, कारीगर हो, व्यापारी हो या उद्यमी - इसी श्रेष्ठता का आकांक्षी होता है।
2. दूसरा स्तंभ: एक पोषक,समावेशी और क्षमाशील समाज
व्यक्ति अकेले नहीं जीता। वह समाज के बीच जन्म लेता है, समाज के संसाधनों से पलता-बढ़ता है और अपनी क्षमताएं समाज को वापस लौटाता है। इसलिए राम राज्य का दूसरा स्तंभ है - समाज की भूमिका।
परन्तु यह समाज एक शासक की भूमिका में नहीं है। यह समाज एक 'पोषक'की भूमिका में है। जैसे एक माँ अपने बच्चे को उसकी प्रकृति और गुणों के अनुसार पालती है - उस पर अपनी इच्छाएं नहीं थोपती - ठीक वैसे ही राम राज्य का समाज प्रत्येक व्यक्ति को उसकी क्षमताओं के अनुसार अवसर देता है।
इस समाज में समावेशिता केवल एक नीति नहीं, बल्कि एक स्वभाव है। यहाँ किसी के साथ जन्म के आधार पर, वर्ण के आधार पर, लिंग के आधार पर या किसी भी अन्य आधार पर भेदभाव नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति को उचित समय पर,उचित संसाधन मिलते हैं - ताकि वह अपने श्रेष्ठतम स्वरूप को प्राप्त कर सके।
इस समाज की एक और महत्वपूर्ण विशेषता है - क्षमाशीलता। हम सब मनुष्य हैं, और मनुष्य से भूल होती है। राम राज्य का समाज इतना उदार और व्यापक है कि यदि कोई व्यक्ति भटक भी जाए, तो समाज उसे त्याग नहीं देता - बल्कि उसे सुधरने का अवसर देता है और फिर से अपने में आत्मसात कर लेता है। यह समाज व्यक्ति को 'सारथी'की तरह मार्गदर्शन देता है - ठीक वैसे जैसे महाभारत में कृष्ण ने अर्जुन को दिया था। वह व्यक्ति के निर्णय की स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए उसे सही दिशा दिखाता है।
सबसे महत्वपूर्ण - यह समाज ऐसा है जहाँ किसी के भीतर हीन भावना का जन्म नहीं होता। न कोई यह सोचता है कि वह किसी से कम है। न कोई अपने काम को छोटा समझता है। न कोई अपनी संस्कृति पर लज्जित होता है। क्योंकि समाज की संरचना ऐसी है जो हर व्यक्ति को, हर कार्य को, हर परंपरा को उचित सम्मान देती है।
3. तीसरा स्तंभ: प्रकृति के साथ शाश्वत सह-अस्तित्व
राम राज्य का तीसरा और सबसे गहरा स्तंभ है - प्रकृति के साथ संबंध। और यह संबंध स्वामी और दास का नहीं,बल्कि पुत्र और माता का है।
भारतीय संस्कृति सदैव से यह मानती आई है कि मनुष्य सृष्टि का स्वामी नहीं, उसका एक अभिन्न अंग है। नदियाँ हमारी माताएं हैं। पर्वत हमारे पिता हैं। वृक्ष हमारे पूर्वज हैं। यह केवल काव्य नहीं - यह एक गहरी दार्शनिक सत्य की अभिव्यक्ति है।
राम राज्य में प्रकृति का दोहन इतना मर्यादित होता है कि उसकी पुनर्जनन शक्ति कभी क्षीण नहीं होती। हम प्रकृति से उतना ही लेते हैं, जितना वह स्वयं पुनः उत्पन्न कर सके। यही 'मर्यादित दोहन'का सिद्धांत है। यही आज की भाषा में 'Circular Economy' है। यही 'Sustainability' है - परन्तु इसकी जड़ें किसी पश्चिमी conference room में नहीं, बल्कि हमारे वेदों और हमारी परंपराओं में हैं।
जब व्यक्ति प्रकृति को माता मानता है, तो उसका शोषण करना उसके लिए न केवल अनैतिक बल्कि अकल्पनीय हो जाता है। यही भाव राम राज्य में हर व्यक्ति और हर उद्यम में होना चाहिए।
एकात्म वाणी और राम राज्य का संकल्प
एकात्म वाणी एक समाचार पोर्टल है। परन्तु हम केवल समाचार नहीं देते। हम उस भारत की कहानी कहते हैं जो राम राज्य की दिशा में बढ़ रहा है - और उन बाधाओं को भी रेखांकित करते हैं जो इस यात्रा में आड़े आती हैं।
हमारी पत्रकारिता इन तीन प्रश्नों पर केंद्रित है -
- क्या यह समाचार मर्यादित व्यक्ति के निर्माण में सहायक है?
- क्या यह समाचार एक पोषक और समावेशी समाज की दिशा में है?
- क्या यह समाचार प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भावना को बल देता है?
यदि हाँ - तो यह हमारी पत्रकारिता का विषय है।
निष्कर्ष: जब तीनों मिलते हैं, तब राम राज्य होता है
जब व्यक्ति मर्यादित और श्रेष्ठ होता है, जब समाज पोषक और क्षमाशील होता है, और जब प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का भाव जीवित होता है - तब वह क्षण राम राज्य का क्षण है।
यह कोई दूर का स्वप्न नहीं है। यह हमारे इतिहास में था। यह हमारे गाँवों की स्मृति में अभी भी जीवित है। और यह हमारे उद्यमों, हमारी पत्रकारिता और हमारे आचरण में पुनः स्थापित किया जा सकता है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने एकात्म मानव दर्शन के माध्यम से इसी राम राज्य का मार्ग प्रशस्त किया था। एकात्म वाणी उसी मार्ग का एक यात्री है - और आप हमारे साथ इस यात्रा में सम्मिलित हैं।
श्री रामस्य राज्यम् - यह हमारा लक्ष्य है, हमारी कसौटी है और हमारी प्रेरणा है।
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