दृश्य याद कीजिए। हर वर्ष छठ के दिन दिल्ली में दोहराया जाता है। यमुना के घाट पर व्रती महिलाएँ कमर तक पानी में खड़ी हैं। हाथों में सूप, उसमें फल और दीप। और उनके चारों ओर तैर रहा है सफेद ज़हरीला झाग। अखबार इसे toxic foam लिखते हैं। वे महिलाएँ उसे हटाकर उसी जल से सूर्य को अर्घ्य देती हैं।

एक ही फ्रेम में दो भारत हैं। एक वह, जिसकी श्रद्धा में नदी आज भी माँ है। दूसरा वह, जिसकी व्यवस्था में नदी एक नाला बन चुकी है। इस लेख का प्रश्न यही है। इन दोनों के बीच की खाई कौन पाटेगा? अदालत? कानून? या कोई तीसरी चीज़, जो हमारे पास सदियों से थी और जिसे हमने ही किनारे रख दिया?

2017: जब अदालत ने कहा, नदी जीवित है

मार्च 2017 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय दिया। गंगा और यमुना जीवित इकाइयाँ हैं। juristic person। यानी कानून की नज़र में व्यक्ति, जिसके अधिकार हैं, दायित्व हैं, और जिसकी ओर से अभिभावक मुकदमा लड़ सकते हैं। तर्क सुंदर था। अगर मंदिर का विग्रह संपत्ति रख सकता है और अदालत में पक्षकार बन सकता है, तो वे नदियाँ क्यों नहीं जो स्वयं देवी हैं?

यह judicial activism भर नहीं था। यह सभ्यता की मरती धमनियों को बचाने की गुहार थी। औद्योगिक अपशिष्ट, सीवेज और अतिक्रमण के विरुद्ध एक कानूनी ढाल।

उसी वर्ष न्यूज़ीलैंड ने दुनिया के सामने एक मिसाल रखी। वहाँ की व्हांगानुई नदी को Te Awa Tupua कानून के तहत जीवित इकाई का दर्जा मिला। माओरी जनजाति ने सौ वर्ष से अधिक लंबी लड़ाई लड़ी थी। और ध्यान दीजिए, किस बात के लिए। स्वामित्व के लिए नहीं। इस स्वीकृति के लिए कि नदी उनकी पूर्वज है। वहाँ की सरकार ने एक आदिवासी विश्वदृष्टि को कानून में जगह दी। सिद्ध हुआ कि आधुनिक विधि व्यवस्था चाहे तो आध्यात्मिक सत्य के आगे झुक सकती है।

पर भारत में कहानी दूसरी दिशा में मुड़ी। कुछ ही महीनों में सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड के आदेश पर रोक लगा दी। कारण व्यावहारिक बताए गए। नदी बाढ़ लाए तो मुआवजा कौन देगा? अभिभावक कौन, सीमा कहाँ तक? आदेश कागज़ पर रह गया। और यमुना का झाग हर छठ पर लौटता रहा।

असली अड़चन: उधार का चश्मा

रोक के कानूनी कारण जो भी हों, असली अड़चन गहरी है। वह हमारी शासन-दृष्टि में है, जो आज भी बड़ी सीमा तक औपनिवेशिक और पश्चिमी साँचे में ढली है।

पश्चिमी विधिशास्त्र का केंद्र मनुष्य है। Enlightenment से निकला Rights का पूरा ढाँचा anthropocentric है। मनुष्य ब्रह्मांड के केंद्र में, प्रकृति उसकी सेवा में। इस दृष्टि में नदी या तो संपत्ति है या संसाधन। बहुत हुआ तो stakeholder। इसी ढाँचे में जब हमने गंगा की दिव्यता को फिट करने की कोशिश की, तो घर्षण होना ही था।

अंतर को साफ देखिए। पश्चिमी ढाँचा transactional है। अधिकार, मुकदमा, मुआवजा, वाद-प्रतिवाद। भारतीय दृष्टि relational है। ऋत, धर्म, संबंध, कृतज्ञता। पश्चिमी कानून sustainable usage तक जाता है, यानी टिकाऊ इस्तेमाल। भारतीय दृष्टि सहअस्तित्व तक जाती है, जहाँ इस्तेमाल शब्द ही अधूरा पड़ जाता है। एक व्यवस्था नदी को दुहना सिखाती है, दूसरी उसे प्रणाम करना।

और यहीं वह कड़वा निष्कर्ष निकलता है। हमने वैदिक मूल्य को लागू करने का काम उस प्रशासनिक ढाँचे को सौंपा जो ब्रिटिश formalism में प्रशिक्षित है। परिणाम वही हुआ जो होना था। समस्या कानूनों की कमी नहीं है। समस्या उनके प्रयोग में भारतीय चेतना की कमी है। हमने नदी की आरती को धरोहर बना लिया और उसमें गिरते नाले को प्रक्रिया।

प्राचीन उत्तर: अधिकार नहीं, ऋत

अब यह देखना रोचक है कि प्राचीन भारत में Rights of Nature का कोई न्यायाधिकरण क्यों नहीं था। इसलिए नहीं कि चेतना कम थी। इसलिए कि आवश्यकता ही नहीं थी। पूरी सभ्यता धर्म और ऋत, यानी लौकिक व्यवस्था की नींव पर खड़ी थी। सृष्टि और स्रष्टा में विभाजन था ही नहीं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र तक, जो घोर व्यावहारिक ग्रंथ है, जल स्रोतों और वनों के प्रबंधन के कठोर नियम रखता है। जल संरचना को क्षति पहुँचाने पर दंड निर्धारित थे। यानी श्रद्धा के साथ राजदंड भी था। ऊपर संस्कार, नीचे व्यवस्था। दोनों मिलकर नदी की रक्षा करते थे। आज हमारे पास दोनों में से एक भी पूरा नहीं है। संस्कार कर्मकांड बन गया, व्यवस्था फाइल।

एकात्म मानव दर्शन: नदी का दर्जा क्या हो

तो रास्ता क्या है? दार्शनिक पुनर्संयोजन। और उसका आधार पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन।

दीनदयाल जी मनुष्य बनाम प्रकृति के पश्चिमी द्वंद्व को ही खारिज करते हैं। व्यक्ति, समाज, सृष्टि, परमेष्ठी एक जैविक इकाई हैं। इस दृष्टि में नदी का दर्जा तय करने के लिए किसी नई परिभाषा की जरूरत नहीं। वह समष्टि का अंग है, यानी हमारी ही विस्तारित देह। उसका प्रदूषण आत्म-प्रदूषण है।

यहीं से Cosmic Rights की भारतीय अवधारणा निकलती है। पश्चिमी अधिकार समझौता-योग्य होते हैं, अदालत में तौले जाते हैं, विकास के तर्क से स्थगित हो जाते हैं। ऋत से निकले अधिकार निरपेक्ष हैं। नदी का बहना उसका ऋत है। उसमें मल गिराना केवल अपराध नहीं, अधर्म है। कानून अपराध रोकता है, संस्कृति अधर्म रोकती है। हमें दोनों चाहिए।

और चिति का सिद्धांत यह भी कहता है कि हर राष्ट्र की आत्मा का अपना स्वभाव होता है। भारत की चिति नदी को माँ कहती है। ऐसे राष्ट्र की जल नीति यदि नदी को resource लिखे, तो वह नीति अपनी ही आत्मा से लड़ रही है। लड़ाई का नतीजा यमुना का झाग है।

आँकड़े, जो आरती के पीछे का सच कहते हैं

श्रद्धा की बात के साथ हिसाब भी सामने रखना जरूरी है, क्योंकि वही नीति की भाषा है।

देश में प्रतिदिन लगभग 72 हज़ार मिलियन लीटर सीवेज पैदा होता है, जबकि उपचार क्षमता लगभग 31-32 हज़ार MLD ही है। यानी आधे से अधिक मल-जल बिना उपचार के सीधे नदियों की ओर बहता है। नमामि गंगे जैसे कार्यक्रमों में हजारों करोड़ लगने के बाद क्षमता बढ़ी है, पर खाई अब भी विशाल है। प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत कोई दूर की फैक्ट्री नहीं, हमारे अपने शहरों का घरेलू सीवेज है। और दिल्ली में तो स्थिति यह है कि सूखे मौसम में यमुना में ताज़ा जल लगभग शून्य होता है। जो बहता दिखता है, वह नदी नहीं, उपचारहीन नाला है। गंगा के कई हिस्सों में स्नान योग्य मानकों से हजारों गुना अधिक faecal coliform मिलता है।

इन आँकड़ों का एक ही अर्थ है। नदी को कागज़ पर व्यक्ति मान लेने से उसके फेफड़ों में गिरता ज़हर नहीं रुकता। दर्जा बदलने से पहले धारा बदलनी होगी। नालों की भी, और सोच की भी।

नीति की दिशा: दर्जे के साथ धारा भी

चार सूत्र।

पहला, कानूनी दर्जे का प्रश्न फिर खोला जाए, पर भारतीय ढंग से। नदी को वादी-प्रतिवादी बनाने की जगह हर नदी के लिए वैधानिक अभिभावक परिषद बने, जिसमें प्रशासन के साथ घाट समुदाय, संत समाज, मछुआरे और किसान हों। न्यूज़ीलैंड का सबक यही है। वहाँ नदी की आवाज़ वह समुदाय बना जिसका उससे पीढ़ियों का संबंध था, कोई दूर बैठा विभाग नहीं।

दूसरा, अविरलता को निर्मलता से पहले रखा जाए। पर्यावरणीय प्रवाह, यानी नदी में न्यूनतम जल की गारंटी हर बाँध और बैराज की शर्त बने। जिस नदी में जल ही नहीं, उसमें शुद्धि की योजनाएँ नाले का श्रृंगार हैं।

तीसरा, सीवेज उपचार में वही आपात गति आए जो सौर ऊर्जा में आई है। लक्ष्य सरल है। एक भी नाला बिना उपचार नदी में न गिरे। तकनीक उपलब्ध है, विकेंद्रित उपचार के मॉडल उपलब्ध हैं। कमी प्राथमिकता की है।

चौथा, संस्कार की वापसी। घाट की शिक्षा। नदी उत्सवों को स्वच्छता व्रत से जोड़ना। जिस दिन छठ की व्रती के साथ पूरा शहर यह मानेगा कि यमुना में झाग हम सबके घर से गया है, उस दिन कानून को अकेले नहीं लड़ना पड़ेगा।

निष्कर्ष: पुरानी शराब, नई बोतल नहीं

गंगा-यमुना को legal person बनाने का प्रयास दिशा में सही था, पर वह लड़खड़ाया। कारण यह कि हमने एक असीम सत्ता को एक सीमित पश्चिमी परिभाषा में उतारने की कोशिश की। पुरानी शराब नई बोतल में नहीं, बल्कि गंगाजल को rights की बोतल में भरने चले थे। वह उसमें अटता ही नहीं।

समाधान अधिक न्यायाधिकरणों में नहीं है। समाधान उस दृष्टि की वापसी में है जो नदी को H2O नहीं, माँ देखती थी, और साथ ही उस राजदंड की वापसी में जो माँ के अपमान पर चलता था। श्रद्धा और शासन, ऋत और नीति, दोनों साथ चलें तो नदी बचती है। अकेला कानून कागज़ी शेर है, अकेली आरती धुआँ।

छठ की वह व्रती हर वर्ष झाग हटाकर अर्घ्य देती रहेगी। सवाल यह है कि हम कब तक उसे झाग सौंपते रहेंगे।