जब दुनिया आज सर्कुलर इकोनॉमी, नेट ज़ीरो, नेट कार्बन न्यूट्रल आदि विषयों की बात करती है, तो मुझे मेरी माँ की याद आती है। जब जेनेवा से लेकर न्यूयॉर्क तक प्रकाशित होने वाले नीति पत्र पढ़ता हूँ, तो माँ द्वारा बोली गई बातें याद आती हैं। वो Reduce, Reuse, Recycle का मंत्र जो आज पश्चिम हमें सिखाना चाहता है, यह वही तो है जिसे आपने और मैंने बचपन से अपनी माताओं से सुना है। आज सवाल यह है कि यह मंत्र अन्य मंत्रों के समान नया किसके लिए है? भारत के लिए तो यह जीवन पद्धति रही है। वही जीवन पद्धति जिसे विगत वर्षों में उपहास की दृष्टि से देखा जाता था।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा 1965 में प्रतिपादित "एकात्म मानव दर्शन", जो एक विशुद्ध भारतीय दर्शन है, के परिपेक्ष्य में हमको समझना चाहिए कि कैसे यह भारतीय संस्कृति का एक मूल भाव ही है। यह भारतीय गृहस्थी का मूल स्वभाव है। और उसका दार्शनिक आधार एकात्म मानव दर्शन में सबसे स्पष्ट रूप में मिलता है।
चतुर्विध सत्ता: व्यक्ति से सृष्टि तक
एकात्म मानव दर्शन का मूल सूत्र यह है कि व्यक्ति, समाज, सृष्टि और परमेष्ठी अलग-अलग इकाइयां नहीं हैं। ये एक ही सत्ता के चार स्तर हैं। व्यक्ति समाज का अंग है। समाज सृष्टि का अंग है। सृष्टि परमेष्ठी की अभिव्यक्ति है। इनमें संघर्ष नहीं, पूरकता है। जब यह एकात्मता समझ में आ जाती है, तब प्रकृति का दोहन असंभव हो जाता है। क्योंकि प्रकृति को नुकसान पहुंचाना अपने ही शरीर को काटने जैसा है।
पश्चिमी चिंतन की नींव अलग है। वहां मनुष्य और प्रकृति के बीच संघर्ष है। मनुष्य विजेता है, प्रकृति संसाधन है। डार्विन का संघर्ष सिद्धांत हो या औद्योगिक क्रांति की भूख, दोनों में प्रकृति जीतने की वस्तु है। इसी सोच से लेना, बनाना, फेंकना का रेखीय मॉडल निकला। पहले जंगल कटे। फिर नदियां मरीं। फिर हवा जहरीली हुई। अब वही सभ्यता हमें सर्कुलैरिटी सिखाने आई है।
भारतीय चिंतन में मनुष्य प्रकृति का उपभोक्ता नहीं, उसका पुत्र है। अथर्ववेद कहता है, माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः। मां से लिया जाता है, लूटा नहीं जाता। ईशावास्योपनिषद का पहला ही मंत्र कहता है, तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः। त्याग पूर्वक भोग करो। यह वाक्य पूरी सर्कुलर इकोनॉमी का बीज मंत्र है।
दोहन नहीं, दोहन का विवेक
दीनदयाल जी ने एक सुंदर उदाहरण दिया था। गाय का दूध निकालना दोहन है। पर बछड़े के हिस्से का दूध छोड़ना विवेक है। यही विवेक भारतीय अर्थचिंतन का आधार है। प्रकृति से उतना ही लो जितना वह पुनः भर सके। इसे आज की भाषा में sustainable extraction कहते हैं। हमारे यहां इसे यज्ञ भावना कहा गया। जो लिया है, उसे लौटाना धर्म है।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी यही सूत्र है। राजा को कोष भरने का अधिकार है, पर प्रजा और प्रकृति को निचोड़ने का नहीं। वन, जल और खनिज के उपयोग के नियम वहां लिखे हैं। जे. सी. कुमारप्पा ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने Economy of Permanence की बात की। स्थायित्व की अर्थव्यवस्था। उनका तर्क था कि जो अर्थव्यवस्था प्रकृति के चक्र से बाहर जाती है, वह अंततः हिंसा पर टिकती है। दत्तोपंत ठेंगड़ी ने भी श्रम और सृष्टि की इसी एकात्मता को अपने चिंतन का केंद्र बनाया।
सर्कुलर इकोनॉमी का पूरा सिद्धांत इसी एक वाक्य में समा जाता है। लो, लौटाओ, फिर लो।
गृहस्थी: सबसे छोटी और सबसे कुशल अर्थव्यवस्था
एकात्म मानव दर्शन व्यक्ति को केवल आर्थिक प्राणी नहीं मानता। वह शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समुच्चय है। उसकी आवश्यकताएं चतुर्विध पुरुषार्थ से नियंत्रित होती हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। अर्थ जरूरी है, पर धर्म के अनुशासन में। यही अनुशासन पारंपरिक भारतीय गृहस्थी में दिखता है। वह गृहस्थी एक उच्च दक्षता वाली सूक्ष्म आर्थिक इकाई थी। बिना किसी सरकारी आदेश के।
एक सूती साड़ी का जीवन देखिए। पहले वह उत्सव का वस्त्र है। फिर घर का पहनावा। फिर बच्चे की झोली। फिर रजाई की परत। और अंत में दीपक की बाती। एक वस्त्र, पांच जन्म। किसी नीति आयोग ने यह नियम नहीं बनाया। यह घर की स्त्री का अर्थशास्त्र था। दादी की गठरी में कुछ भी बेकार नहीं होता था। पुराने स्वेटर का ऊन खुलकर नया स्वेटर बनता था। फटी चादर झाड़न बनती थी। हर वस्तु की एक अगली भूमिका तय थी।
रसोई में अन्नं ब्रह्म की भावना थी। अन्न फेंकना पाप था। बचा भोजन गाय का था, पक्षियों का था, या कल की नई रेसिपी का। बासी रोटी से चूरमा बनता था। बचे चावल से फरा। सब्जी के छिलके गाय के लिए। राख बर्तन मांजने के लिए। अपशिष्ट की अवधारणा ही नहीं थी, क्योंकि हर वस्तु का अगला उपयोग तय था। कचरा दर्शन की विफलता से पैदा होता है, गरीबी से नहीं। यह बात भारतीय रसोई ने सदियों पहले सिद्ध कर दी थी।
सृष्टि के साथ सहजीवन: वास्तु, जल और कृषि
हमारी वास्तुकला स्थानीय मिट्टी, चूने और लकड़ी से बनती थी। घर अपनी आयु पूरी करके बिना विष छोड़े धरती में लौट जाता था। आज का कंक्रीट का मलबा हजार साल तक नहीं गलेगा। कल का मिट्टी का घर अगली फसल की खाद बन जाता था।
जल के क्षेत्र में हमारी इंजीनियरिंग और भी परिष्कृत थी। चरणकूप, बावड़ियां, मंदिर के तालाब, आहर पईन प्रणाली। ये सजावट नहीं थे। ये जल संचयन और चक्रीय उपयोग के इंजीनियर किए हुए तंत्र थे। वर्षा का पानी रुकता था, रिसता था, भूजल बनता था, फिर कुएं से लौटता था। एक पूरा चक्र।
कृषि में गौ धन का सहजीवी चक्र था। गाय खेत को उर्वरक देती थी, खेत गाय को चारा। गोबर से ईंधन, दूध से पोषण, मूत्र से कीटनाशक। एक पशु, पांच उत्पाद, शून्य अपशिष्ट। आज इसी को integrated farming कहकर पश्चिमी विश्वविद्यालय शोध पत्र लिख रहे हैं।
जीवित प्रमाण: जहां संस्कृति बची है, वहां चक्र चल रहा है
यह सब अतीत की बात नहीं है। जहां सांस्कृतिक ताना-बाना सुरक्षित है, वहां चक्र आज भी घूम रहा है।
मुंबई की डब्बावाला प्रणाली में लाखों टिफिन रोज घर से दफ्तर जाते हैं और लौटते हैं। कोई डिस्पोजेबल नहीं। दुनिया के प्रबंधन संस्थान इस पर केस स्टडी पढ़ाते हैं। मंदिरों की अन्नक्षेत्र व्यवस्था हजारों को पत्तल पर भोजन कराती है और पत्तल खाद बन जाती है। पीतल और तांबे के बर्तन पीढ़ियों तक चलते हैं और अंत में गलाकर नए बन जाते हैं। बर्तन कभी कचरा नहीं बनता, धातु बनकर लौटता है। गांव का घर गोबर और मिट्टी से लीपा जाता है। और शहरों का कबाड़ीवाला भारत की सबसे बड़ी अनौपचारिक रीसाइक्लिंग व्यवस्था चलाता है। बिना किसी सब्सिडी के। मोची, दर्जी, बर्तन कलई करने वाला। यह पूरा repair economy का जाल है जिसे हमने कभी अर्थव्यवस्था माना ही नहीं।
उपभोक्तावाद: अर्थ का प्रभाव
दीनदयाल जी ने दो स्थितियों से बचने को कहा था। अर्थ का अभाव और अर्थ का प्रभाव। अभाव में मनुष्य धर्म छोड़ देता है। प्रभाव में भी छोड़ देता है। 1990 के बाद का भारत अर्थ के प्रभाव की चपेट में है।
उदारीकरण के बाद एक व्यवस्थित पुनर्ब्रांडिंग हुई। मितव्ययिता को कंजूसी कहा गया। पुराने का पुनर्उपयोग पिछड़ापन कहलाया। जो मरम्मत कराता है, वह गरीब माना गया। जो फेंककर नया खरीदता है, वह सफल। हर त्योहार खरीदारी का उत्सव बन गया। EMI संस्कृति ने इच्छा और क्षमता का अंतर मिटा दिया। जो संस्कृति वस्तु को पूरा जीवन देती थी, उसे use and throw सिखाया गया।
नीति ने भी इसमें भूमिका निभाई। हमारी कर व्यवस्था बड़े संगठित उत्पादकों के पक्ष में झुकी है। पत्तल बनाने वाला कारीगर और प्लास्टिक प्लेट की फैक्ट्री, दोनों के लिए मैदान बराबर नहीं है। मरम्मत पर भी कर, नए उत्पाद पर भी कर। ऐसे में चक्र टूटता है और कचरा जीतता है।
यह केवल पर्यावरण का संकट नहीं है। यह दर्शन का संकट है। जब उपभोग ही पुरुषार्थ बन जाए, तब कचरे के पहाड़ बनते ही हैं। दिल्ली का गाजीपुर लैंडफिल कुतुब मीनार की ऊंचाई छूने लगा है। यह इंजीनियरिंग की विफलता नहीं है। यह विचार की विफलता है।
नीति की दिशा: अंत्योदय और स्वदेशी
अब प्रश्न यह है कि किया क्या जाए। एकात्म मानव दर्शन उत्तर देता है। अर्थव्यवस्था का लक्ष्य अंतिम व्यक्ति का उदय हो। अंत्योदय। और उत्पादन का आधार स्वदेशी हो, विकेंद्रित हो। इस दृष्टि से कुछ ठोस कदम सुझाए जा सकते हैं।
पहला, गैर-प्लास्टिक और पारंपरिक पैकेजिंग पर कर छूट मिले। पत्तल, दोना, जूट, कपड़ा, बांस। हर पत्तल एक प्लास्टिक प्लेट को हटाती है और एक ग्रामीण परिवार को रोजगार देती है। यही अंत्योदय और पर्यावरण का संगम है।
दूसरा, मरम्मत अर्थव्यवस्था को औपचारिक पहचान मिले। मोची, दर्जी, इलेक्ट्रॉनिक्स सुधारने वाले, कबाड़ से कारीगरी करने वाले। इन्हें MSME ढांचे में स्थान मिले, ऋण मिले, कौशल प्रमाणन मिले। Right to Repair केवल कानून न रहे, आजीविका बने।
तीसरा, कारीगर आधारित उत्पादन को उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं में शामिल किया जाए। बड़ी फैक्ट्री को PLI मिल सकता है तो कुम्हार और बुनकर के क्लस्टर को क्यों नहीं।
चौथा, शिक्षा में मितव्ययिता को गौरव का विषय बनाया जाए, लज्जा का नहीं। बच्चा स्कूल में सीखे कि दादी की गठरी दुनिया का सबसे पुराना सर्कुलर मॉडल थी।
ध्यान रहे, यह पुरातनपंथ नहीं है। दीनदयाल जी ने ही कहा था कि परंपरा युगानुकूल होनी चाहिए। हमें बैलगाड़ी में नहीं लौटना। हमें उस विवेक में लौटना है जो बैलगाड़ी के युग में था और जिसे आज की तकनीक के साथ जोड़ा जा सकता है। डब्बावाला के पास आज ऐप है, पर टिफिन आज भी लौटता है। कबाड़ीवाले के पास कल डिजिटल मार्केटप्लेस होगा, पर धातु आज भी गलकर लौटेगी। यही युगानुकूल परंपरा है।
निष्कर्ष: जड़ों की ओर, आगे की ओर
दुनिया को नए आर्थिक सिद्धांत की तलाश है। भारत के पास सिद्धांत नहीं, सिद्ध जीवन है। सर्कुलर इकोनॉमी की हर श्वेत पत्रिका अनजाने में हमारे पूर्वजों की गृहस्थी का प्रमाणपत्र है। पश्चिम प्रयोग कर रहा है। हम स्मरण कर सकते हैं। प्रयोग में भूल की गुंजाइश होती है। स्मरण में परंपरा का प्रमाण होता है।
एकात्म मानव दर्शन हमें याद दिलाता है कि व्यक्ति, समाज और सृष्टि एक हैं। जो अर्थव्यवस्था इस एकात्मता पर खड़ी होगी, वहां अपशिष्ट अपने आप शून्य होगा। क्योंकि जहां कुछ भी पराया नहीं, वहां कुछ भी फेंकने योग्य नहीं।
शून्य-अपशिष्ट गृहस्थी कोई कल्पनालोक नहीं है। वह हमारा अतीत थी। विवेक से अपनाएं तो वही हमारा भविष्य है।
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