बचपन की एक छवि आज भी आँखों में है। आँगन में तांबे का लोटा। उगते सूर्य की ओर उठे हुए हाथ। जल की धार गिरती हुई, और साथ में मंत्र। तत्सवितुर्वरेण्यं। तब यह रोज़ का नियम भर लगता था। आज समझ आता है कि वह अर्घ्य क्या था। वह ऊर्जा के स्रोत के प्रति कृतज्ञता का दैनिक, विकेंद्रित, व्यक्तिगत अनुबंध था। कोई संधि नहीं, कोई सम्मेलन नहीं। बस एक लोटा जल और एक झुका हुआ मस्तक।

आज जब अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन, यानी International Solar Alliance की बैठकों की खबरें पढ़ता हूँ, तो वही आँगन याद आता है। और एक प्रश्न उठता है। क्या ISA केवल गीगावाट और डॉलर का हिसाब है? या यह उस सभ्यता की स्मृति का जागरण है जिसने सूर्य को कभी संसाधन नहीं, देवता माना?

मेरा तर्क है कि ISA भारत की सबसे बड़ी दार्शनिक कूटनीति बन सकता है। बशर्ते हम उसे अपनी आँखों से देखें, आयातित चश्मे से नहीं।

सूर्यपुत्रों का गठबंधन

पहले तथ्य समझ लें। ISA भारत की पहल पर बना वैश्विक मंच है, जिसका मुख्यालय भारत में है। इसका लक्ष्य कर्क और मकर रेखा के बीच बसे देशों को, जिन्हें सूर्यपुत्र कहा गया, सौर ऊर्जा के सामूहिक दोहन के लिए संगठित करना है। सौ से अधिक देश इसके हस्ताक्षरकर्ता हैं। लक्ष्य विराट हैं: 2030 तक 1,000 गीगावाट सौर क्षमता और 1,000 अरब डॉलर का निवेश। और इसके ऊपर वह स्वप्न जो केवल भारतीय कल्पना ही देख सकती थी। One Sun, One World, One Grid। एक सूर्य, एक विश्व, एक ग्रिड।

कागज़ पर यह कूटनीतिक उत्कृष्टता है। ISA गरीब देशों को उस अंधेरे से बचाता है जो जीवाश्म ईंधन की उतार-चढ़ाव भरी कीमतों से आता है। यह Global South को ऊर्जा में आत्मनिर्भरता का रास्ता देता है। पर असली प्रश्न ढाँचे का नहीं, चेतना का है। क्या इस गठबंधन का गहरा प्रयोजन पूरा हो रहा है?

आकाश की बैटरी बनाम जगत की आत्मा

उत्तर अभी हाँ नहीं है। Hardware लग रहा है, पर software अब भी उधार का है। हमारी सौर नीति का निष्पादन पश्चिमी उपयोगितावादी सोच के हवाले है।

पश्चिम प्रकृति को जीतने, बेचने और तिजारत करने की वस्तु मानता है। उसका जलवायु समाधान भी सौदागरी है: कार्बन क्रेडिट, cap-and-trade, वित्तीय derivatives। पर्यावरण तभी बचेगा जब बचाना लाभदायक हो। यह आत्माविहीन गणित है।

हमारी नीतियाँ भी अक्सर इसी साँचे में ढल जाती हैं। सफलता केवल गीगावाट और ROI में मापी जाती है। सूर्य देवता को हमने आकाश में टँगी बैटरी बना दिया है। दिव्यता को utility में घटा दिया है। ऋग्वेद जिसे सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च कहता है, यानी सूर्य चर और अचर, समस्त जगत की आत्मा है, उसे हम प्रति यूनिट टैरिफ में तौल रहे हैं।

अंतर सूक्ष्म है पर निर्णायक है। पश्चिम की भाषा में यह Green Energy है। भारत की भाषा में यह प्राण ऊर्जा है। पहली में सूर्य साधन है, दूसरी में संबंध। अगर ISA केवल पैनलों और tariffs का कार्टेल बनकर रह गया, तो उसमें वह नैतिक बल नहीं होगा जो मानव व्यवहार को स्थायी रूप से बदल सके।

प्राचीन भारत: सूर्य से तालमेल की सभ्यता

हमारे पूर्वजों ने सूर्य का उपयोग कैसे किया, यह देखने लायक है। उन्होंने सूर्य को बाहरी वस्तु की तरह harness नहीं किया। उससे अपना जीवन align किया।

वास्तुकला देखिए। कोणार्क का सूर्य मंदिर। मोढेरा का सूर्य मंदिर। ये केवल पूजा स्थल नहीं थे। ये खगोलीय ज्यामिति पर खड़ी वेधशालाएँ थीं, जो पूरे समुदाय की दिनचर्या को सौर चक्रों से जोड़ती थीं। मोढेरा में विषुव के दिन सूर्य की पहली किरण सीधे गर्भगृह तक पहुँचती थी। यह श्रद्धा और विज्ञान का संगम है।

कृषि देखिए। पंचांग सौर-चांद्र गणना पर टिका कैलेंडर था। बुवाई, सिंचाई, कटाई, सब सूर्य की गति से बंधे थे। इसीलिए मिट्टी कभी निचुड़ती नहीं थी। आधुनिक औद्योगिक खेती से ठीक उलट।

और दिनचर्या देखिए। वही अर्घ्य, जिससे मैंने बात शुरू की। हर नागरिक का प्रकृति के प्रति निजी उत्तरदायित्व। ऊर्जा का उपभोग नैतिक कृत्य था, आर्थिक अधिकार नहीं। यही वह सूत्र है जो आज की हर जलवायु संधि से गायब है।

जहाँ परंपरा और तकनीक मिले: तीन उदाहरण

सुखद बात यह है कि भारत में ऐसे उदाहरण बन रहे हैं जहाँ silicon में सावित्री की उपासना उतरी है।

मोढेरा, गुजरात। वही प्राचीन सूर्य मंदिर वाला गाँव भारत का पहला चौबीसों घंटे सौर ऊर्जा से चलने वाला गाँव घोषित हुआ। रात में वह हजार साल पुराना मंदिर उसी देवता की ऊर्जा से जगमगाता है जिसे वह समर्पित है। तकनीक परंपरा की सेवा में। इससे सुंदर प्रतीक क्या होगा।

कोचीन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा। विश्व का पहला पूर्णतः सौर ऊर्जा चालित airport। प्रमाण कि आधुनिकतम अधोसंरचना भी प्रकृति से बिना बैर चल सकती है।

और PM-KUSUM तथा PM सूर्य घर योजनाएँ। किसान यानी अन्नदाता का सीधा संबंध ऊर्जादाता सूर्य से। बंजर भूमि पर बिजली उगाता किसान, अपनी छत पर बिजली बनाता परिवार। यह ग्राम स्वराज की उसी विकेंद्रित परंपरा की वापसी है जिसमें गाँव आत्मनिर्भर था। लाखों घर अब उत्पादक बन चुके हैं, केवल उपभोक्ता नहीं।

एकात्म मानव दर्शन: संयम के बिना सौर भी शोषण है

अब वह दार्शनिक आधार, जिसके बिना यह पूरा विमर्श अधूरा है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन।

दीनदयाल जी ने पश्चिम के मनुष्य बनाम प्रकृति वाले द्वंद्व को ही अस्वीकार किया। व्यक्ति, समाज, सृष्टि और परमेष्ठी एक जैविक इकाई हैं। और उनका वह कालजयी भेद: दोहन और शोषण। माँ गाय दुहती है, बछड़े का हिस्सा छोड़कर। कसाई गाय का शोषण करता है।

इस कसौटी पर एक असुविधाजनक बात कहनी होगी। सौर ऊर्जा भी शोषण बन सकती है। अगर लक्ष्य केवल यह है कि अमर्यादित उपभोग अब पैनलों से चले, तो हमने ईंधन बदला है, रोग नहीं। पैनल भी खनन माँगते हैं, भूमि माँगते हैं, और आयु पूरी होने पर कचरा बनते हैं। इसीलिए एकात्म दृष्टि कहती है कि उत्पादन में सामंजस्य के साथ उपभोग में संयम अनिवार्य है। हरित ऊर्जा प्लस संयम, यही धार्मिक ऊर्जा नीति है। हरित ऊर्जा माइनस संयम केवल हरा रंगा हुआ उपभोक्तावाद है।

भारत की चिति, यानी राष्ट्र की आत्मा, मूलतः पारिस्थितिक है। ISA के मंच से भारत का प्रस्ताव यही होना चाहिए। सूर्य किसी फैक्ट्री का कच्चा माल नहीं, वसुधैव कुटुम्बकम् वाले परिवार का केंद्र है।

आँकड़े जो अधिकार देते हैं

यह केवल भावुक दावा नहीं है। भारत ने बोलने का अधिकार अर्जित किया है।

भारत की स्थापित सौर क्षमता 150 गीगावाट का आँकड़ा पार कर चुकी है, और नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में भारत अब विश्व में तीसरे स्थान पर है, केवल चीन और अमेरिका से पीछे। बीते वित्त वर्ष में देश ने लगभग 45 गीगावाट सौर क्षमता जोड़ी, जो अब तक की सबसे बड़ी वार्षिक छलांग है। जुलाई 2025 में एक ऐतिहासिक क्षण आया जब देश की आधी से अधिक बिजली माँग नवीकरणीय स्रोतों से पूरी हुई। और पेरिस समझौते का 2030 वाला लक्ष्य भारत ने पाँच वर्ष पहले ही छू लिया।

सबसे बड़ी बात, भारत में सौर बिजली का टैरिफ थर्मल से सस्ता हो चुका है। यह भारतीय मितव्ययिता और इंजीनियरिंग की जीत है। जो पश्चिम उपदेश देते हुए तेल के नए कुएँ खोद रहा है, उसके सामने भारत आचरण से बोल रहा है।

ढाँचा तैयार है। अब उस पर आत्मा बिठानी है।

नीति की दिशा

तीन सूत्र।

पहला, ISA के मंच पर भारत केवल तकनीक और वित्त की भाषा न बोले। दोहन बनाम शोषण का दर्शन बोले। Mission LiFE को ISA के एजेंडे से जोड़े, ताकि जीवनशैली परिवर्तन वैश्विक विमर्श बने।

दूसरा, घरेलू नीति विकेंद्रीकरण की ओर झुके। विशाल केंद्रीकृत पार्कों के साथ-साथ हर छत, हर खेत, हर पंचायत उत्पादक बने। अर्घ्य विकेंद्रित था। ऊर्जा भी विकेंद्रित हो।

तीसरा, सौर कचरे की चिंता आज से हो। पैनलों के पुनर्चक्रण की नीति और उद्योग अभी खड़ा किया जाए, वरना तीस वर्ष बाद हम हरित क्रांति की तरह हरित ऊर्जा के भी दुष्परिणाम गिन रहे होंगे।

निष्कर्ष: लोटे से ग्रिड तक

अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन एक चौराहे पर खड़ा है। वह tariffs की तिजारत करने वाला तकनीकी मंच रह सकता है। या वह मानवता और ब्रह्मांड के संबंध को पुनर्परिभाषित करने वाला आंदोलन बन सकता है।

रास्ता हमारे अतीत से रोशन है। आँगन के उस लोटे से लेकर One Sun One World One Grid तक एक ही रेखा जाती है। कृतज्ञता की रेखा। भारत दुनिया को सिर्फ सोलर पैनल नहीं बेच रहा। भारत वह दृष्टि दे रहा है जिसमें ऊर्जा उपासना है, उपभोग संयम है, और सूर्य परिवार का मुखिया है।

सूर्य भारतीय दृष्टि पर कभी अस्त नहीं होता। बस शर्त एक है। हम उसे अपनी आँखों से देखें।