पहली सुबह 1926 की है। एक किसान ब्रह्म मुहूर्त में उठता है। सूर्योदय से पहले। दातुन, तेल का कुल्ला, शरीर पर सरसों का तेल, कुएँ का ठंडा पानी। फिर खेत की ओर, जहाँ दिन भर का व्यायाम काम की शक्ल में उसकी प्रतीक्षा कर रहा है। भोजन में वही है जो इस ऋतु में उसके अपने खेत ने दिया है। सूर्य ढलने के बाद हल्का भोजन, और जल्दी नींद। उसने जीवन में कभी BP नहीं नपवाया। जरूरत ही नहीं पड़ी।

दूसरी सुबह 2026 की है। उसी किसान का प्रपौत्र शहर में साढ़े सात बजे तीसरे alarm पर उठता है। उठते ही आँखों के सामने screen। नाश्ता या तो छूटता है या packet से निकलता है। दिन कुर्सी पर, रात screen पर, नींद आधी। और मेज़ पर उसकी पिछले महीने की रिपोर्ट रखी है। fasting sugar सीमा से ऊपर। उम्र चौंतीस।

सौ वर्षों में हमने विकास की अपनी अवधारणा से देश में बड़े बड़े अस्पताल तो बहुत बना लिए, जो निश्चित ही एक सरहानिया कदम है। पर इस विकास की दौड़ में हमने अपनी सांस्कृतिक विरासत जो स्वस्थ्य जीवन के सिद्धांतों पर आधारित है को कहीं छोड़ दिया। इसको छोड़ने का कारण सहज नहीं है, अपितु बाज़ारवादी ताकतों ने संस्कृति को ही नीचा या पिछड़ा दिखाया, जिसने विगत 4 पीढ़ियों में पतन ला दिया। और इस लेख का तर्क यही है। भारत का स्वास्थ्य संकट चिकित्सा का संकट नहीं है। वह जीवनचर्या का संकट है। और उसका उत्तर उस विज्ञान में है जो बीमार को ठीक करने से पहले स्वस्थ को स्वस्थ रखना जानता था।

एक स्पष्टता, सबसे पहले

आगे बढ़ने से पहले एक बात दो टूक। यह लेख आधुनिक चिकित्सा के विरुद्ध नहीं है। दुर्घटना, संक्रमण, शल्य क्रिया और आपात स्थिति में allopathy मानवता की अमूल्य उपलब्धि है, और उसके वैज्ञानिकों का ऋण हम पर है। जो कोई चल रहा उपचार छुड़वाकर केवल परहेज़ बताए, वह वैद्य नहीं, खतरा है।

प्रश्न प्रतिस्पर्धा का नहीं, संतुलन का है। आधुनिक चिकित्सा रोग उपचार में असाधारण है। पर स्वास्थ्य रक्षण, यानी रोग को आने ही न देना, यह उसका स्वभाव नहीं, आयुर्वेद का है। चरक संहिता अपना प्रयोजन ही दो चरणों में लिखती है। स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्, आतुरस्य विकार प्रशमनम्। पहले स्वस्थ की रक्षा, फिर रोगी का उपचार। हमारी राष्ट्रीय नीति ने पहला चरण लगभग छोड़ दिया है। पूरा तंत्र दूसरे चरण पर खड़ा है। और यही असंतुलन आँकड़ों में चीख रहा है।

आँकड़े: आग नहीं, धुआँ गिनती व्यवस्था

ICMR-INDIAB अध्ययन के अनुसार भारत में लगभग दस करोड़ लोग मधुमेह के साथ जी रहे हैं। विश्व में सर्वाधिक। लगभग उतने ही pre-diabetic हैं, यानी कतार में खड़े हैं। देश की कुल मृत्युओं में साठ प्रतिशत से अधिक अब गैर-संचारी रोगों से होती हैं। हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह। यानी वे रोग जो किसी विषाणु से नहीं, जीवनशैली से आते हैं।

अब व्यवस्था की प्रतिक्रिया देखिए। हर बजट में और अस्पताल, और उपकरण, और bed। यह आवश्यक है, पर पर्याप्त नहीं। यह fire-fighting है। आग बुझाने का महकमा बड़ा होता जा रहा है, और कोई नहीं पूछ रहा कि आग लग क्यों रही है। हमारे पूर्वजों की पद्धति fire-proofing थी। घर ऐसा बनाओ कि आग लगे ही नहीं।

इस उलटफेर की एक संरचनात्मक वजह भी समझ लीजिए, बिना किसी पर दोष मढ़े। आधुनिक स्वास्थ्य अर्थव्यवस्था का राजस्व रोग से जुड़ा है, आरोग्य से नहीं। रोकथाम का कोई invoice नहीं बनता। जो व्यवस्था बीमारी के प्रबंधन से चलती है, वह रोकथाम को प्राथमिकता दे भी तो कैसे। इसीलिए रोकथाम बाज़ार का नहीं, नीति और संस्कृति का काम है। और यहीं भारत के पास वह पूँजी है जो किसी के पास नहीं।

दिनचर्या और ऋतुचर्या: घड़ी और कैलेंडर की चिकित्सा

आयुर्वेद की सबसे बड़ी देन कोई औषधि नहीं है। वह है यह दृष्टि कि स्वास्थ्य कोई commodity नहीं, अनुशासन है। और उसके दो स्तंभ हैं। दिनचर्या और ऋतुचर्या। घड़ी की चिकित्सा और कैलेंडर की चिकित्सा।

दिनचर्या को अंधविश्वास समझने वालों के लिए आज का विज्ञान ही उत्तर है। जिस क्षेत्र को अब chronobiology कहा जाता है, जिस पर Nobel तक मिल चुका है, वह यही कहता है कि शरीर की हर कोशिका एक जैविक घड़ी से चलती है, और उस घड़ी का सूर्य से तालमेल टूटना ही अनेक रोगों की जड़ है। ब्रह्म मुहूर्त का जागरण, सूर्य के साथ भोजन, सूर्यास्त के बाद हल्का आहार और समय पर नींद। यह पूरा ढाँचा circadian rhythm का ही अनुशासन है, बस हजारों वर्ष पुरानी भाषा में।

उसी सूची में गंडूष है, यानी तेल का कुल्ला, जो मुख स्वच्छता का उपाय था। अभ्यंग है, यानी तेल मालिश, जो रक्त संचार और स्नायु के लिए। और व्यायाम का वह विलक्षण सूत्र, अर्धशक्ति। अपनी आधी क्षमता तक व्यायाम, ताकि बल बने, टूटन नहीं। आज के overtraining और gym injuries के युग में यह एक पंक्ति कितने काम की है, सोचिए।

ऋतुचर्या दूसरा स्तंभ है। ग्रीष्म में शीतल और द्रव आहार, हेमंत में स्निग्ध और पौष्टिक। यह स्वाद का चुनाव नहीं, ऋतु के अनुसार शरीर की बदलती जरूरत की गणना थी। हर छह ऋतुओं के लिए आहार-विहार का अलग विधान। इसे परंपरा ने त्रिदोष के संतुलन की भाषा में कहा। भाषा पर अटकिए मत, पद्धति देखिए। वह पूर्णतः अवलोकन आधारित, पीढ़ियों में परखा हुआ preventive protocol है।

और भारतीय रसोई? वह घर की पहली फार्मेसी थी। हल्दी, जीरा, अदरक, हींग, मेथी। स्वाद के बहाने औषधि रोज़ की थाली में उतरती थी। अखाड़ों की परंपरा देखिए, जहाँ आहार और नींद का अनुशासन लोहे के शरीर गढ़ता था। यह सब मिलाकर एक ही बात सिद्ध होती है। हमारे यहाँ रोकथाम कोई अभियान नहीं थी। वह संस्कृति थी।

एकात्म मानव दर्शन: चौथाई मनुष्य का इलाज नहीं

अब दार्शनिक चौखट। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन कहता है कि मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा की समग्र इकाई है। चारों में से किसी एक का उपचार पूरे का उपचार नहीं है।

आधुनिक चिकित्सा का reductionist ढाँचा प्रायः शरीर तक सीमित रहता है। पर आज उसका अपना ही शोध कह रहा है कि तनाव उच्च रक्तचाप बढ़ाता है, अवसाद हृदय रोग से जुड़ा है, अकेलापन आयु घटाता है। यानी मन की उपेक्षा कर शरीर का इलाज अधूरा है। आयुर्वेद और योग इस अधूरेपन को पहले दिन से जानते थे, क्योंकि उनकी मनुष्य की परिभाषा ही समग्र थी।

एकात्म दृष्टि एक कदम और आगे जाती है। व्यक्ति सृष्टि से जुड़ा है। इसलिए रसायनों में उगाया अन्न खिलाकर रसायनों से इलाज करना पूरे तंत्र का अंतर्विरोध है। सच्ची स्वास्थ्य नीति में जैविक कृषि, स्वच्छ जल और शुद्ध वायु भी स्वास्थ्य बजट का हिस्सा हैं। अस्पताल का बजट स्वास्थ्य का नहीं, बीमारी का बजट है। स्वास्थ्य का बजट खेत, रसोई, खेल का मैदान और नींद में लगता है।

नीति की दिशा: उपचार से आरोग्य तक

चार सूत्र।

पहला, दिनचर्या और ऋतुचर्या को राष्ट्रीय स्वास्थ्य साक्षरता का विषय बनाया जाए। विद्यालय के पाठ्यक्रम से लेकर आशा कार्यकर्ता के प्रशिक्षण तक। जिस देश ने योग को विश्व में प्रतिष्ठित कर दिया, वह दिनचर्या को घर-घर क्यों नहीं पहुँचा सकता।

दूसरा, एकीकृत चिकित्सा को व्यवस्था का स्वभाव बनाया जाए, नारे का नहीं। wellness केंद्रों में आयुर्वेद, योग और आधुनिक जाँच साथ बैठें। रोगी को दोनों का लाभ मिले, और दोनों धाराओं के चिकित्सक एक-दूसरे को संदेह से नहीं, सहयोग से देखें। साथ ही AYUSH में प्रमाण-आधारित शोध पर बड़ा निवेश हो, क्योंकि परंपरा का सम्मान उसे कसौटी पर कसने से होता है, अंधभक्ति से नहीं।

तीसरा, प्रोत्साहन की दिशा पलटे। बीमा और नीति उसे reward करे जो स्वस्थ रहता है। रोकथाम पर खर्च को उपचार पर बचत के रूप में गिनने की लेखा-दृष्टि आए।

चौथा, अन्न नीति को स्वास्थ्य नीति से जोड़ा जाए। मोटे अनाज की वापसी, ऋतु के स्थानीय आहार का प्रोत्साहन, ultra-processed भोजन पर स्पष्ट चेतावनी। थाली सुधरे बिना कोई राष्ट्र नहीं सुधरता।

निष्कर्ष: तीसरी सुबह

लेख दो सुबहों से शुरू हुआ था। अंत एक तीसरी सुबह की कल्पना से कीजिए।

2036 की सुबह। वही युवक, अब चवालीस का। उसने दवा नहीं छोड़ी, चिकित्सक के परामर्श से घटाई है। वह छह बजे उठता है। screen से पहले सूर्य देखता है। थाली में ऋतु का अन्न है। शाम को आधे घंटे की चाल है। उसकी रिपोर्ट सामान्य की ओर लौट रही है। उसने कोई चमत्कारी नुस्खा नहीं अपनाया। उसने बस अपने परदादा की घड़ी वापस पहन ली है।

यही इस पूरे विमर्श का सार है। विकसित भारत की पहली शर्त स्वस्थ भारत है। और स्वस्थ भारत अस्पतालों की संख्या से नहीं बनेगा। वह उन करोड़ों सुबहों से बनेगा जो सूर्य के साथ उठती हैं। रास्ता नया नहीं है। वह प्राचीन है। हमें केवल उस पर फिर चलने का साहस चाहिए।