वर्ष 1931। रत्नागिरी। एक मंदिर का द्वार खुला। पतित पावन मंदिर। उसकी प्रतिष्ठा में यह घोषणा निहित थी कि यहाँ प्रवेश के लिए जन्म नहीं देखा जाएगा। हर हिंदू, हर जाति का, गर्भगृह तक जा सकेगा। वीर सावरकर की प्रेरणा से बने इस मंदिर में फिर सहभोज हुए। वे लोग एक पंगत में बैठे जिन्हें सदियों की रूढ़ि ने अलग-अलग बैठाया था।

ध्यान दीजिए, यह किसी अदालत का आदेश नहीं था। कोई कानून नहीं, कोई आंदोलन की जीत नहीं। यह धर्म के भीतर से उठा सुधार था। किसी को शत्रु बताए बिना, किसी को अपमानित किए बिना।

आज, लगभग एक शताब्दी बाद, यह प्रसंग एक असुविधाजनक प्रश्न खड़ा करता है। स्वतंत्र भारत ने सामाजिक न्याय के लिए संविधान, आरक्षण और कानूनी सुरक्षा का विशाल ढाँचा खड़ा किया। नीयत पर संदेह नहीं। पर सात दशक बाद ईमानदारी से पूछना होगा। क्या समुदायों के बीच की भावनात्मक खाई पटी है? या पहचानें और कठोर हुई हैं, और सामाजिक न्याय की भाषा धीरे-धीरे राजनीतिक प्रतिशोध की भाषा बनती गई है?

यह लेख इसी प्रश्न की पड़ताल है। और इसका उत्तर खोजने के लिए हमें उस चश्मे की जाँच करनी होगी जिससे हम इस समस्या को देखते आए हैं।

पहले सच स्वीकारें

एक बात शुरू में ही साफ कर देना जरूरी है। जातिगत भेदभाव भारतीय समाज का यथार्थ रहा है। छुआछूत हमारे इतिहास का कलंक है, और उसके घाव आज भी पूरी तरह भरे नहीं हैं। जो इस सच से आँख चुराता है, वह समरसता की बात करने का नैतिक अधिकार खो देता है। सुधार की पहली शर्त स्वीकार है।

प्रश्न भेदभाव के अस्तित्व पर नहीं है। प्रश्न उसके उपचार की पद्धति पर है। और यहीं दो रास्ते अलग होते हैं।

आयातित चश्मा: वर्ग संघर्ष

स्वतंत्रता के बाद हमारे बौद्धिक विमर्श ने भारतीय समाज को मुख्यतः एक पश्चिमी सिद्धांत के चश्मे से देखा। मार्क्स का वर्ग संघर्ष। इस मॉडल में समाज एक रणभूमि है। एक ओर शोषक, दूसरी ओर शोषित। न्याय का अर्थ है सत्ता का हस्तांतरण। एक की हार में दूसरे की जीत। zero-sum game।

जब यह ढाँचा जाति प्रश्न पर आरोपित हुआ, तो उसका परिणाम सोचनीय रहा। न्याय की जगह प्रतिशोध की राजनीति ने ली। पीढ़ियों को सिखाया गया कि उनकी पहचान की पहली ईंट किसी दूसरे समूह के विरुद्ध शिकायत है। हर चुनाव में जातियों की गिनती हुई, हर आंदोलन में दरार गहरी हुई। जो पहचानें घुलनी चाहिए थीं, वे संगठित हो गईं। हमने विभाजन को संस्थागत कर दिया और उसे न्याय का नाम दे दिया।

पश्चिमी पद्धति और भारतीय पद्धति का अंतर सूत्र में समझिए। एक का केंद्र अधिकार है, दूसरी का धर्म यानी कर्तव्य। एक भिन्नताओं पर बल देती है, दूसरी साझा संस्कृति पर। एक का मार्ग आंदोलन है, दूसरी का संवाद। एक का लक्ष्य सत्ता है, दूसरी का समरसता। पश्चिमी मन विभाजित करके समझता है। भारतीय मन जोड़कर।

भारतीय दृष्टि: पूरकता, पदानुक्रम नहीं

हमारी सभ्यता की मूल कल्पना क्या थी, यह भी ईमानदारी से देखें। मूल दर्शन में समाज विराट पुरुष है, एक जीवंत शरीर, जिसके अंग भिन्न कार्य करते हैं पर मूल्य में समान हैं। हाथ और पैर में ऊँच-नीच नहीं होती। शरीर के लिए दोनों अनिवार्य हैं। यह पूरकता का मॉडल था, परस्पर निर्भरता का।

इस दृष्टि की जीवंतता के प्रमाण हमारे सबसे ऊँचे शिखरों पर बैठे हैं। रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि। वेदों के संपादक और महाभारत के रचयिता वेदव्यास। आज की कठोर परिभाषाओं में इन्हें जो भी जन्म मिला हो, हिंदू ज्ञान परंपरा के ये सर्वोच्च पितामह हैं। संत रविदास और संत कबीर की वाणी मंदिरों और घरों में समान श्रद्धा से गाई जाती है। ज्ञान और पूज्यता का द्वार जन्म से बंद नहीं था।

हाँ, कालांतर में विकृतियाँ आईं। रूढ़ि ने कर्म की व्यवस्था को जन्म की जकड़न बना दिया। मध्यकाल की उथल-पुथल और फिर औपनिवेशिक जनगणना की श्रेणीबद्धता ने इन जकड़नों को और कठोर किया। पर विकृति का इलाज मूल दर्शन की वापसी है, उसका विध्वंस नहीं। बीमार अंग का उपचार होता है, शरीर का विच्छेदन नहीं।

समरसता के सिद्ध प्रयोग

यह केवल सिद्धांत नहीं है। इसके सफल प्रयोग हमारे सामने हैं।

पतित पावन मंदिर की बात हो चुकी। उसी परंपरा में देश भर के हजारों गाँवों में सामाजिक संगठनों ने, जिनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सेवा भारती के प्रकल्प प्रमुख हैं, बिना किसी आंदोलन के दीवारें गिराई हैं। पद्धति सरल है। समवेत पूजा। सहभोज। एक कुआँ, एक मंदिर, एक श्मशान। सबके लिए। कोई शत्रु घोषित नहीं किया जाता। किसी वर्ग पर आक्रमण नहीं होता। अपील धर्म की भावना से की जाती है, अपराधबोध से नहीं। और अनुभव यह है कि जो बदलाव भय या कानून से बरसों में नहीं होता, वह आत्मीयता से ऋतुओं में हो जाता है।

इस पद्धति की एक और विशेषता समझने योग्य है। यह सुधार को बाहरी विजय नहीं, आंतरिक शुद्धि मानती है। जब गाँव का पुजारी स्वयं वंचित बस्ती में कथा करने जाता है, जब मंदिर का प्रसाद सबसे पहले उस घर पहुँचता है जिसे कभी द्वार से लौटाया गया था, तो बदलने वाला केवल वंचित का जीवन नहीं होता। बदलता वह भी है जिसने बहिष्कार की परंपरा ढोई थी। संघर्ष मॉडल में एक पक्ष हारता है। समरसता मॉडल में दोनों पक्ष मुक्त होते हैं। एक अपमान से, दूसरा अपराध से।

क्योंकि कानून व्यवहार बदल सकता है। हृदय नहीं। कानून ने छुआछूत को अपराध बनाया, यह अनिवार्य और ऐतिहासिक कदम था, और उसका श्रेय संविधान निर्माताओं को सदा मिलना चाहिए। पर पंगत में साथ बैठना कोई धारा अनिवार्य नहीं कर सकती। पड़ोसी के बेटे के विवाह में सहज निमंत्रण कोई अनुच्छेद सुनिश्चित नहीं कर सकता। वह संस्कार से आता है। कानून ने मैदान समतल किया है। उस मैदान पर साथ चलना समाज को स्वयं सीखना है।

एकात्म मानव दर्शन: अंत्योदय आत्मरक्षा है

इस पूरे दृष्टिकोण का दार्शनिक आधार पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन है। दीनदयाल जी मनुष्य और समाज के विखंडन के विरुद्ध थे। व्यक्ति, समाज, सृष्टि और परमेष्ठी संघर्षरत इकाइयाँ नहीं, समकेंद्रित वृत्त हैं।

वे पश्चिम के Social Contract सिद्धांत को भी अस्वीकार करते हैं, जिसमें व्यक्ति मूलतः पृथक हैं और स्वार्थवश अनुबंध में बंधते हैं। भारतीय दृष्टि में समाज अनुबंध से नहीं जन्मा। हम जैविक बंधन लेकर जन्मते हैं। इसीलिए यहाँ वंचित का उत्थान परोपकार नहीं है। वह आत्मरक्षा है। शरीर के एक अंग में पीड़ा हो तो पूरा शरीर रोगी है। संघर्ष रोग का लक्षण है, समरसता स्वास्थ्य का।

अंत्योदय इसी का व्यावहारिक रूप है। पंक्ति के अंतिम व्यक्ति का उदय, प्रतिशोध से नहीं, पूरे समाज के संकल्प से।

समरसता की भौतिक नींव: आर्थिक स्वामित्व

यहाँ एक कदम और आगे जाना जरूरी है, जो प्रायः छूट जाता है। समरसता केवल भावना से स्थायी नहीं होती। उसे भौतिक आधार चाहिए। और वह आधार है आर्थिक स्वामित्व।

जब वंचित समुदाय का युवा नौकरी माँगने वाला नहीं, नौकरी देने वाला बनता है, तो सामाजिक समीकरण अपने आप बदलता है। उद्यमिता सम्मान की सबसे छोटी सड़क है। दलित उद्यमियों के संगठनों का अनुभव यही कहता है। जिस बस्ती में दस उद्यमी खड़े होते हैं, वहाँ की अगली पीढ़ी शिकायत की नहीं, स्वामित्व की भाषा बोलती है। इसलिए सामाजिक न्याय की सबसे दूरगामी योजना आरक्षित पद नहीं, पूँजी, बाज़ार और कौशल तक बराबर पहुँच है। संवाद हृदय जोड़ता है, स्वामित्व हैसियत। समरसता को दोनों चाहिए।

नीति और समाज की दिशा

चार सूत्र।

पहला, संवाद को संस्था बनाएँ। हर जिले में समरसता मंच, जहाँ सभी समुदायों के प्रमुख नियमित बैठें। विवाद अदालत पहुँचने से पहले पंगत तक पहुँचे।

दूसरा, सहभोज और साझा उत्सव को सार्वजनिक जीवन का स्थायी अंग बनाएँ। एक कुआँ, एक मंदिर, एक श्मशान का संकल्प हर गाँव का संकल्प बने।

तीसरा, वंचित समुदायों की उद्यमिता को मिशन का दर्जा मिले। खरीद में अवसर, ऋण तक सहज पहुँच, mentorship। स्वामित्व की भागीदारी ही सम्मान की स्थायी गारंटी है।

चौथा, भाषा बदलें। नीति और विमर्श में अगड़े-पिछड़े युद्धरत श्रेणियाँ नहीं, राष्ट्र निर्माण के सहभागी कहे और माने जाएँ। शब्द चेतना गढ़ते हैं।

निष्कर्ष: घाव और शरीर

भारत का जाति प्रश्न वास्तविक है, और उसके घाव भी। पर घाव का इलाज शरीर को रणभूमि मानकर नहीं होता। वर्ग संघर्ष का आयातित मॉडल सात दशकों में दरारें गहरी ही कर सका, क्योंकि वह हमारे सामाजिक शरीर को शत्रु शिविरों में बाँटकर देखता है। भारत की आत्मा विभाजन में नहीं, एकात्मता में धड़कती है।

सच्चा सामाजिक न्याय वह है जिसमें न्याय कानूनी बाध्यता से ऊपर उठकर आध्यात्मिक कर्तव्य बन जाए। जिसमें वंचित का उत्थान दया नहीं, आत्मरक्षा माना जाए। और जिसमें रत्नागिरी के उस मंदिर की तरह द्वार भीतर से खोले जाएँ, बाहर से तोड़े नहीं जाएँ।

संघर्ष से सत्ता बदलती है। समरसता से समाज। हमें तय करना है कि हमें क्या बदलना है।