एक आँकड़े से शुरू करते हैं। अनुमान है कि भारत की धार्मिक संस्थाएँ मिलकर प्रतिदिन तीन करोड़ से अधिक निःशुल्क भोजन कराती हैं। तीन करोड़। यानी हर रोज़ पूरे ऑस्ट्रेलिया की आबादी के बराबर लोग बिना एक पैसा दिए भोजन करते हैं। इसके लिए कोई मंत्रालय नहीं है। कोई बजट सत्र नहीं। कोई फाइल नहीं। कोई पात्रता प्रमाणपत्र नहीं।

अब दो कतारों की कल्पना कीजिए। एक कतार सरकारी दफ्तर के बाहर है। हाथ में फॉर्म, आधार की फोटोकॉपी, आय प्रमाणपत्र। पात्रता सिद्ध कीजिए, तब लाभ मिलेगा। दूसरी कतार लंगर की है। वहाँ कोई नहीं पूछता कि आप कौन हैं, कहाँ से आए हैं, आपकी जाति क्या है, आय कितनी है। बैठिए, भोजन कीजिए।

पहली कतार Welfare State की है। दूसरी समाज की। और यह लेख इसी अंतर की पड़ताल है। क्योंकि आधुनिक विमर्श हमें बार-बार Civil Society की पश्चिमी अवधारणा थमाता है, जबकि भारत के पास उससे कहीं प्राचीन, कहीं विशाल और कहीं जीवंत संस्था है। समाज।

Civil Society और समाज का भेद

पश्चिमी समाजशास्त्र में Civil Society का अर्थ है नागरिक और राज्य के बीच खड़ी मध्यस्थ संस्थाएँ। NGO, ट्रस्ट, एडवोकेसी समूह। इनका आधार अनुबंध है, अधिकार है, funding है। इनमें से कई विदेशी वित्त पोषण पर चलती हैं और जिस समाज की बात करती हैं, उससे उनका जैविक संबंध प्रायः क्षीण होता है।

भारतीय समाज इससे भिन्न सत्ता है। वह अनुबंध से नहीं, धर्म से बंधा है। उसकी प्रेरणा transaction नहीं, सेवा है। उसका ढाँचा नौकरशाही नहीं, समुदाय है। पश्चिमी दान में देने वाला ऊपर होता है, पाने वाला नीचे। भारतीय सेवा में देने वाला कृतज्ञ होता है कि उसे सेवा का अवसर मिला। नर सेवा नारायण सेवा। यह hierarchy नहीं, साधना है।

सहस्राब्दियों तक भारत में राजसत्ता कभी समाज-कल्याण की एकमात्र संरक्षक नहीं रही। भूखे को अन्न, निराश्रित को आश्रय और जिज्ञासु को विद्या देने का काम समाज करता था, अपनी धार्मिक और आध्यात्मिक संस्थाओं के माध्यम से। मंदिर, मठ, गुरुद्वारा, ये केवल पूजा स्थल नहीं थे। ये राष्ट्र की सामाजिक-आर्थिक रीढ़ थे।

आयातित Welfare State की चूक

फिर 1947 आया। सत्ता का हस्तांतरण हुआ, पर चिंतन का नहीं। स्वतंत्र भारत के नीति शिल्पियों ने, जो Fabian समाजवाद और पश्चिमी उदारवाद से गहरे प्रभावित थे, यूरोप का Welfare State मॉडल भारतीय समाज पर आरोपित कर दिया।

इस मॉडल में राज्य सर्वोच्च प्रदाता है और नागरिक अधिकारों का निष्क्रिय प्राप्तकर्ता। हर काम के लिए मंत्रालय बना। अन्न वितरण से शिक्षा तक। पंचवर्षीय योजनाओं में खरबों रुपये बहे। परिणाम? कुपोषण बना रहा। मूल्य आधारित शिक्षा घटती गई। और सबसे गहरी क्षति यह हुई कि जब गरीब की चिंता समाज से छीनकर सरकार को सौंप दी गई, तो समाज का नैतिक बंधन ढीला पड़ने लगा। पड़ोसी की भूख अब मेरी जिम्मेदारी नहीं, किसी योजना का लक्ष्य बन गई। करुणा का स्थान प्रक्रिया ने ले लिया।

नौकरशाही की अपनी सीमा भी जुड़ गई। कल्याण की हर योजना लंबी शृंखला से गुजरती है, और शृंखला की हर कड़ी पर रिसाव की आशंका रहती है। एक पूर्व प्रधानमंत्री की वह स्वीकारोक्ति प्रसिद्ध ही है कि केंद्र से चला एक रुपया अंतिम व्यक्ति तक पहुँचते-पहुँचते चंद पैसे रह जाता है। उधर लंगर की रसोई में रिसाव की गुंजाइश ही नहीं, क्योंकि देने वाला, बनाने वाला और परोसने वाला, तीनों एक ही भाव से बंधे हैं। जवाबदेही ऊपर किसी अधिकारी के प्रति नहीं, भीतर अपने धर्म के प्रति है। लेखा-परीक्षा से बड़ी लेखा-परीक्षा।

प्राचीन ढाँचा: राजा ट्रस्टी, मंदिर केंद्र

प्राचीन भारत में यह व्यवस्था कैसे चलती थी, यह देखना शिक्षाप्रद है। राजा भूमि और धन का स्वामी नहीं, न्यासी था। सामाजिक भरण-पोषण की असली शक्ति विकेंद्रित संस्थाओं के पास थी। मंदिर गाँव की अर्थव्यवस्था का केंद्र था। वहाँ अन्नक्षेत्र था, पाठशाला थी, वैद्य था, जलाशय का प्रबंधन था, कला और संगीत का पोषण था। दक्षिण के बड़े मंदिरों के शिलालेख बताते हैं कि वे सिंचाई से लेकर अकाल राहत तक का प्रबंधन करते थे।

इस पूरे तंत्र का ईंधन था दान। यह बलपूर्वक वसूला गया कर नहीं था। यह संस्कार था कि कमाई का एक अंश समाज का है। सिख परंपरा ने इसे दसवंध के रूप में व्यवस्थित किया। आय का दसवाँ भाग समाज के लिए। चूँकि समुदाय सीधे कल्याण का वित्त पोषण करता था, जवाबदेही तत्काल थी और प्रशासनिक खर्च लगभग शून्य। यह कर्तव्य का अर्थशास्त्र था। सरकार रहित सामाजिक सुरक्षा, जो पीढ़ियों तक बिना किसी अधिनियम के चली।

आज के जीवित प्रमाण

और यह अतीत का गुणगान भर नहीं है। आज भी यही समाज राज्य से बड़ा कल्याण तंत्र चला रहा है।

अमृतसर का स्वर्ण मंदिर प्रतिदिन लगभग एक लाख लोगों को लंगर कराता है। बिना अवकाश, बिना पात्रता सूची। अक्षय पात्र फाउंडेशन प्रतिदिन लगभग बीस लाख बच्चों को विद्यालयों में भोजन पहुँचाता है, मंदिर परंपरा से निकली रसोई और आधुनिक तकनीक के संगम से। सेवा भारती के पौने दो लाख से अधिक सेवा प्रकल्प वंचित बस्तियों में शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वावलंबन का काम कर रहे हैं। एकल विद्यालय अभियान अस्सी हज़ार से अधिक गाँवों तक पहुँचकर लाखों वनवासी बच्चों को शिक्षा दे रहा है। और सत्य साईं ट्रस्ट के अस्पताल हृदय की जटिल शल्य चिकित्साएँ पूर्णतः निःशुल्क करते हैं। उन अस्पतालों में billing counter नाम की चीज़ ही नहीं है।

इन आँकड़ों को जोड़िए तो समझ आता है कि समाज वह भार उठा रहा है जिसके नीचे राज्य का ढाँचा अकेला दब जाता। तिरुपति से वैष्णो देवी तक, अजमेर से शिरडी तक, हर बड़ा आस्था केंद्र अपने चारों ओर शिक्षा, चिकित्सा और अन्न का वृत्त बनाए हुए है। यह उत्सव का विषय होना चाहिए था। पर विडंबना यह है कि हमारा मुख्यधारा विमर्श इसे दर्ज तक नहीं करता।

एकात्म मानव दर्शन: राज्य अंग है, समाज आत्मा

इस पूरे अनुभव की दार्शनिक व्याख्या पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन में मिलती है। दीनदयाल जी ने पूंजीवाद और साम्यवाद, दोनों के अंधानुकरण का विरोध किया था। दोनों में राज्य या बाज़ार केंद्र में है, समाज हाशिये पर।

उनका सूत्र उल्टा है। राज्य राष्ट्र का एक अंग मात्र है। आत्मा समाज है। हर राष्ट्र की एक चिति होती है, उसकी अपनी प्रकृति। भारत की चिति धर्म-केंद्रित है, राज्य-केंद्रित नहीं। इसीलिए भारत में वह व्यवस्था सफल होती है जो समाज को सशक्त करे, वह नहीं जो समाज की जगह लेने चले।

दूसरा सूत्र, विकेंद्रीकरण। अर्थव्यवस्था का गुरुत्व केंद्र स्थानीय समुदाय हो। लंगर और अन्नक्षेत्र इसी के सिद्ध मॉडल हैं। और तीसरा, धर्म से नियंत्रित अर्थ। संपत्ति का पुनर्वितरण हिंसा या बल से नहीं, संस्कार से हो। दसवंध और दान यही अहिंसक पुनर्वितरण हैं, जो कर व्यवस्था से पहले सदियों तक चले।

अंत्योदय की कसौटी भी यहीं जुड़ती है। पंक्ति के अंतिम व्यक्ति का उदय। सरकारी योजना उस तक पात्रता की जाँच के बाद पहुँचती है। लंगर उस तक पहले पहुँचता है, क्योंकि वहाँ पात्रता का एक ही मापदंड है। भूख।

नीति की दिशा: नियंत्रण नहीं, सहयोग

तो राज्य क्या करे? चार सूत्र।

पहला, भूमिका बदले। समाज की संस्थाओं का नियंत्रक नहीं, सुविधादाता बने। जो काम समाज बेहतर कर रहा है, उसमें राज्य बाधा न बने।

दूसरा, मंदिर प्रबंधन के प्रश्न पर गंभीर और न्यायसंगत विमर्श हो। जिस देश में हर पंथ की संस्थाएँ स्वायत्त हैं, वहाँ लाखों मंदिरों का प्रशासन सरकारी विभागों के पास होना एक विषमता है। मंदिर की आय मंदिर के सेवा प्रकल्पों में लौटे, यह न्यूनतम अपेक्षा है।

तीसरा, साझेदारी के मॉडल बनें। अक्षय पात्र और मध्याह्न भोजन योजना का सहयोग सिद्ध कर चुका है कि समाज की करुणा और राज्य का पैमाना मिलें तो परिणाम कई गुना होता है। यही मॉडल स्वास्थ्य, कौशल और वृद्ध सेवा में दोहराया जाए।

चौथा, दान की संस्कृति को नीति का संरक्षण मिले। सेवा संस्थाओं के लिए सरल पंजीकरण, पारदर्शिता के सहज मानक और दानदाताओं को प्रोत्साहन। साथ में यह विवेक भी कि पारदर्शिता के नाम पर वह जकड़न न आ जाए जो सेवा भाव को ही सुखा दे।

निष्कर्ष: सरकार से बड़ा समाज

मंदिरों, गुरुद्वारों और मठों के सेवा कार्यों का यह लेखा-जोखा एक बात असंदिग्ध रूप से सिद्ध करता है। भारतीय समाज सक्षम है, उदार है, और स्व-नियमित है। उसे सिखाने के लिए विदेशी वित्त पोषित प्रवचनों की आवश्यकता नहीं है। उसे केवल वह स्थान लौटाना है जो सदियों से उसका था।

जब सरकार मंदिर की जगह लेने चलती है, तो करुणा की जगह नौकरशाही आ जाती है। और जब समाज को उसका काम लौटा दिया जाता है, तो कल्याण योजना नहीं रहता, स्वभाव बन जाता है।

दो कतारें फिर याद कीजिए। लक्ष्य यह नहीं कि दूसरी कतार पहली जैसी हो जाए। लक्ष्य यह है कि पहली कतार को दूसरी से सीखने की विनम्रता आ जाए।