दृश्य देखिए। एक शीर्ष योद्धा अपने जीवन के सबसे बड़े मोर्चे पर खड़ा है। और ठीक निर्णय के क्षण में उसका शरीर जवाब दे जाता है। अंग शिथिल हो रहे हैं। मुख सूख रहा है। शरीर में कंपन है। रोंगटे खड़े हैं। हाथ से धनुष फिसल रहा है। त्वचा जल रही है। वह कहता है, मैं खड़ा रहने में समर्थ नहीं हूँ। मेरा मन घूम रहा है।
यह वर्णन गीता के पहले अध्याय का है, अर्जुन का। पर इन लक्षणों को आज किसी भी चिकित्सक के सामने रखिए। वह इसे तीव्र तनाव की अवस्था कहेगा। panic। burnout का चरम क्षण। यानी मानव इतिहास का पहला विस्तार से दर्ज कार्यकारी संकट कुरुक्षेत्र में हुआ था। एक ऐसा नेतृत्वकर्ता, जो क्षमता के शिखर पर है, पर निर्णय के भार से टूट रहा है।
और उसके बाद जो हुआ, वह इतिहास का पहला leadership counseling session है। अठारह अध्याय। कोई छुट्टी की सलाह नहीं, कोई पलायन नहीं। संकट के मैदान में ही चेतना का पुनर्निर्माण। इसीलिए यह लेख कहता है कि आधुनिक नेतृत्व की जिस समस्या को दुनिया आज VUCA, burnout और mindfulness की शब्दावली में समझ रही है, उसका सबसे परिपक्व शास्त्र भारत के पास सहस्राब्दियों से है। आवश्यकता उसे प्रबंधन की भाषा में पुनः पढ़ने की है।
आधुनिक संकट: क्षमता बहुत, दिशा नहीं
पहले संकट का आकार देखिए। आज का नेतृत्वकर्ता, चाहे वह corporate हो या प्रशासनिक, चार शब्दों की दुनिया में जीता है। Volatility, Uncertainty, Complexity, Ambiguity। अस्थिरता, अनिश्चितता, जटिलता, अस्पष्टता। निर्णयों की गति बढ़ी है, उनके परिणामों की भविष्यवाणी घटी है।
हमारे प्रबंधन संस्थान और प्रशासनिक अकादमियाँ इस युद्ध के लिए योद्धा गढ़ती हैं। रणनीति, वित्त, मानव संसाधन, और अब Emotional Intelligence भी। फिर भी परिदृश्य देखिए। burnout को WHO ने बाकायदा occupational phenomenon के रूप में वर्गीकृत किया है। corporate fraud के प्रकरण थमते नहीं। विषाक्त कार्य-संस्कृति की चर्चा हर सर्वे में है। और नौकरी छोड़ने वालों से कारण पूछिए, तो वेतन के साथ-साथ एक नया उत्तर बार-बार आता है। purpose की कमी। काम का अर्थ नहीं दिखता।
यानी IQ है, EQ भी सिखा दिया गया, फिर भी नेतृत्व टूट रहा है। कमी किस quotient की है?
पश्चिमी चश्मे की सीमा: मनुष्य एक संसाधन
उत्तर उस नींव में है जिस पर आधुनिक प्रबंधनशास्त्र खड़ा है। वह औद्योगिक क्रांति की संतान है। उसकी मूल कल्पना में मनुष्य एक resource है। शब्द पर ध्यान दीजिए। Human Resource। मानव संसाधन। यानी कोयले और पूँजी की ही एक और श्रेणी, जिससे अधिकतम output निकालना है।
इस दृष्टि में सफलता का एक ही अर्थ है। संचय और वर्चस्व। winner takes all। तिमाही परिणाम ही परम सत्य। इस ढाँचे में तनाव का इलाज भी बाहरी है। छुट्टी, resort, weekend। यानी मशीन को ठंडा करने के लिए कुछ देर बंद कर दो, फिर उसी भट्टी में झोंक दो। भीतर कुछ बदलने का प्रश्न ही नहीं, क्योंकि इस दर्शन के पास भीतर नाम की कोई चीज़ है ही नहीं। आत्मा उसके balance sheet में नहीं आती।
गीता का उत्तर: कर्म पर अधिकार, फल पर नहीं
अब गीता का केंद्रीय सूत्र इस संकट पर रखिए। कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। तेरा अधिकार कर्म पर है, फलों पर कभी नहीं।
इस एक वाक्य को प्रबंधन की भाषा में अनुवाद कीजिए तो वह performance anxiety की चिकित्सा है। जो नेतृत्वकर्ता चौबीसों घंटे तिमाही परिणाम से चिपका है, उसका हर निर्णय भय और लोभ की धुंध से गुजरता है। भय गलती करवाता है, लोभ अनैतिकता। इसके विपरीत जो प्रक्रिया की उत्कृष्टता और कर्म की धार्मिकता पर केंद्रित है, उसका चित्त निर्णय के क्षण में निर्मल रहता है। परिणाम की चिंता ने ही तो अर्जुन का गांडीव गिराया था। कर्तव्य के बोध ने उठवाया।
ध्यान रहे, निष्काम कर्म का अर्थ महत्वाकांक्षा का त्याग नहीं है। यह सबसे प्रचलित गलतफहमी है। गीता युद्ध से विरत नहीं करती, युद्ध के लिए ही तैयार करती है। वह केवल आसक्ति काटती है, उद्यम नहीं। पूरी शक्ति से लक्ष्य साधो, पर अपनी पहचान और शांति को परिणाम के पलड़े पर मत रखो। यही detachment वह आंतरिक stress management है जिसका कोई पश्चिमी विकल्प resort नहीं दे सकता।
इसी साधना का शिखर है स्थितप्रज्ञ। दुख में उद्विग्न नहीं, सुख में लालायित नहीं। भय, राग और क्रोध से मुक्त बुद्धि। गीता का दूसरा अध्याय वस्तुतः आदर्श निर्णयकर्ता का job description है, जो हर crisis-management पाठ्यक्रम से पहले पढ़ा जाना चाहिए।
राजर्षि: सत्ता और साधुता का संगम
भारतीय परंपरा ने इस चेतना वाले नेतृत्व को एक नाम भी दिया था। राजर्षि। राजा जो ऋषि भी है। सत्ता के शिखर पर बैठा हुआ, पर भीतर से विरक्त। जनक इसका आदर्श हैं। साम्राज्य चलाते हुए भी अनासक्त, इसीलिए न्याय में निर्भय।
राजर्षि मॉडल की कुंजी यह है कि यहाँ अर्थ, धर्म से कटा हुआ नहीं है। नेतृत्व का प्रयोजन लाभ का अधिकतमीकरण नहीं, प्रजा का योगक्षेम है। लाभ साधन है, कल्याण साध्य। जिस दिन यह क्रम उलटता है, उसी दिन बही-खातों में fraud की पहली प्रविष्टि होती है। नैतिक पतन दरअसल दार्शनिक पतन का लक्षण है।
एकात्म मानव दर्शन: चार आयामों का नेतृत्व
इस पूरी दृष्टि को समकालीन चौखट पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन देता है। दीनदयाल जी कहते हैं कि मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समुच्चय है। चारों की भूख अलग है, और चारों का पोषण अनिवार्य।
अब इसे संगठन पर लागू कीजिए। शरीर की भूख वेतन और सुविधाएँ पूरी करती हैं। मन की भूख कौशल, चुनौती और सृजन से मिटती है। बुद्धि की भूख मूल्यों और नैतिक स्पष्टता से। और आत्मा की भूख purpose से। यह बोध कि मेरा श्रम किसी बड़े कल्याण से जुड़ा है।
आधुनिक संगठन पहले आयाम में उदार है, दूसरे में सक्रिय, तीसरे में औपचारिक, और चौथे में प्रायः शून्य। इसीलिए ऊँचे वेतन वाले लोग भीतर से खाली हैं, और खाली लोग या तो टूटते हैं या भटकते हैं। जिन संगठनों ने अपने काम को स्पष्ट मूल्य और प्रयोजन से जोड़ा है, उनके यहाँ टिकाव और निष्ठा का अनुभव अलग है, यह अब वैश्विक शोध भी दोहराता है। दीनदयाल जी की भाषा में कहें तो एकात्म संगठन वही है जो अपने हर सदस्य के चारों आयामों का यजमान बने।
और व्यष्टि से समष्टि वाला सूत्र यहाँ भी लागू है। नेतृत्वकर्ता का चित्त संगठन का वातावरण बनता है। अशांत नेतृत्व अशांत संस्था गढ़ता है। इसीलिए भारतीय दृष्टि में leadership development का पहला पाठ्यक्रम आत्म-विकास है। स्वयं को साधे बिना संस्था साधना असंभव है।
व्यवहार में उतारने के सूत्र
चार ठोस दिशाएँ।
पहली, प्रबंधन और प्रशासनिक शिक्षा में भारतीय चिंतन औपचारिक रूप से पढ़ाया जाए। गीता का दूसरा अध्याय, कौटिल्य का नेतृत्व प्रकरण, और एकात्म मानव दर्शन case studies के साथ। Indian Ethos in Management अब कुछ संस्थानों में है, उसे शोभा का विषय नहीं, नींव का विषय बनाना है।
दूसरी, नेतृत्व मूल्यांकन में चौथा आयाम जुड़े। target पूरा करने वाला अधिकारी अगर टीम को जलाकर पूरा करता है, तो वह संस्था की दीर्घकालिक पूँजी खा रहा है। स्थितप्रज्ञता को KPI की भाषा में लाना कठिन है, पर 360-degree मूल्यांकन में चित्त की स्थिरता और नैतिक साहस के संकेतक जोड़े जा सकते हैं।
तीसरी, दैनिक अभ्यास। दिन का आरंभ कुछ क्षणों के मौन और आत्म-निरीक्षण से, बैठकों में निर्णय से पहले ठहराव, और सप्ताह में एक बार यह प्रश्न कि इस काम से किसका कल्याण हुआ। यह कर्मकांड नहीं, चित्त की स्वच्छता है।
चौथी, राजर्षि की कसौटी सार्वजनिक जीवन में भी। प्रशासनिक प्रशिक्षण अकादमियों में नैतिक द्विविधाओं का अभ्यास गीता की पद्धति से हो। अर्जुन की तरह प्रश्न पूछना सिखाया जाए, क्योंकि जो नेतृत्व प्रश्न नहीं पूछता, वह संकट में उत्तर नहीं खोज पाता।
निष्कर्ष: गांडीव फिर उठाना है
इक्कीसवीं सदी के नेतृत्व की खोज घूमकर कुरुक्षेत्र पहुँचती है। आज का boardroom और सचिवालय उन्हीं द्वंद्वों से भरा है जो अर्जुन के थे। भय, संशय, अपनों से टकराव, परिणाम का बोझ।
पश्चिम ने हमें प्रबंधन की तकनीक दी है, और वह उपयोगी है। पर तकनीक हाथ को साधती है, चेतना को नहीं। भारत के पास वह शास्त्र है जो निर्णयकर्ता के भीतर उतरता है। निष्काम कर्म, स्थितप्रज्ञता, राजर्षि आदर्श और एकात्म दृष्टि। यह Spiritual Intelligence किसी अनुष्ठान की माँग नहीं करती। वह केवल यह माँगती है कि नेतृत्वकर्ता स्वयं को resource नहीं, आत्मा माने, और अपने लोगों को भी।
अर्जुन की विशेषता यह नहीं थी कि वह टूटा नहीं। विशेषता यह थी कि वह टूटकर, समझकर, फिर खड़ा हुआ। गांडीव फिर उठा। आज के हर नेतृत्वकर्ता के भीतर वही यात्रा प्रतीक्षा कर रही है। विषाद से स्थितप्रज्ञता तक।
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