प्रिय अभ्युदय,
तुम्हारे चयन का समाचार मिला। देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक में तुम्हारा नाम ऊपर की पंक्ति में है। पूरा परिवार उत्सव में है। मोहल्ले में मिठाई बँटी है। coaching संस्थान ने होर्डिंग पर तुम्हारा चित्र लगा दिया है।
मैं भी प्रसन्न हूँ। पर आज तुम्हें बधाई से आगे की एक बात लिखना चाहता हूँ। वह बात, जो होर्डिंग पर नहीं लिखी जाती।
बेटा, तुमसे पिछले चार वर्षों में हजारों प्रश्न पूछे गए। भौतिकी के, गणित के, रसायन के। पर एक प्रश्न किसी ने नहीं पूछा। न परीक्षा में, न interview में। वह प्रश्न यह है। तुम कैसे मनुष्य बनोगे?
अजीब लगेगा। पर हमारी परंपरा में शिक्षा का पहला प्रश्न यही था। और मेरा यह पत्र इसी छूटे हुए प्रश्न के बारे में है।
साक्षरता और विद्या का अंतर
हमारे यहाँ दो शब्द हैं, और दोनों का अंतर समझना तुम्हारे पूरे जीवन की दिशा तय करेगा। एक है शिक्षा, जो आज साक्षरता और कौशल बन गई है। सूचना का संचय, तकनीक की धार। यह अनिवार्य है। इसी से रोटी चलती है, इसी से राष्ट्र का आर्थिक इंजन चलता है। शास्त्र इसे अविद्या कहते थे। बुरा अर्थ मत निकालना। अविद्या यानी लौकिक ज्ञान, जीवनयापन की विद्या। उपनिषद कहते हैं, अविद्या से मनुष्य मृत्यु को पार करता है, यानी जीवन की भौतिक चुनौतियों को।
दूसरा शब्द है विद्या। सा विद्या या विमुक्तये। विद्या वह है जो मुक्त करे। भय से, लोभ से, क्षुद्रता से, अज्ञान से। यह आत्मा का प्रकाशन है। स्वामी विवेकानंद ने इसे एक पंक्ति में कह दिया था। शिक्षा मस्तिष्क में ठूँसी गई सूचनाओं का ढेर नहीं है। शिक्षा है जीवन-निर्माण, मनुष्य-निर्माण, चरित्र-निर्माण करने वाले विचारों का आत्मसात।
तुम्हारे पास पहला वाला ज्ञान भरपूर है। मेरा पत्र दूसरे के लिए है। क्योंकि अकेला कौशल तेज़ चाकू है। वह सब्जी भी काट सकता है और गला भी। दिशा चाकू में नहीं होती। दिशा चरित्र में होती है। हमने पीढ़ियों को reactor बनाना सिखा दिया, पर युद्ध की नीति नहीं। algorithmic trading सिखा दी, पर धन के धर्म का पाठ नहीं। परिणाम अखबारों में रोज़ छपता है। बड़ी डिग्रियों वाले बड़े घोटाले।
यह चूक कहाँ से आई
तुम पूछोगे, यह कमी आई कहाँ से। तो थोड़ा इतिहास सुनो।
आज की हमारी शिक्षा प्रणाली की नींव मैकाले की सोच पर रखी गई थी, जिसका घोषित प्रयोजन प्रशासन के लिए उपयोगी कर्मचारी गढ़ना था। मनुष्य वहाँ resource था, उत्पाद था। स्वतंत्रता के बाद ढाँचा वही रहा, बस उत्पाद बदल गया। पहले clerk बनते थे, अब engineer और manager बनते हैं। उत्पादन-रेखा वही है। उसमें चरित्र नाम का विभाग है ही नहीं, क्योंकि जिस पश्चिमी उपयोगितावाद से वह रेखा आई, उसके पास आत्मा का खाता नहीं है।
इसीलिए तुमने देखा होगा, तुम्हारी पूरी यात्रा में सफलता की एक ही परिभाषा दोहराई गई। rank और package। तुम्हारे coaching hub में जो तनाव तुमने और तुम्हारे मित्रों ने झेला, जिन साथियों को टूटते देखा, वह किसी की व्यक्तिगत कमजोरी नहीं थी। वह उस प्रणाली का स्वभाव है जो मनुष्य को output मानती है।
हमारी अपनी पद्धति क्या थी
अब वह सुनो जो तुम्हें किसी ने नहीं बताया होगा। तक्षशिला और नालंदा में, जहाँ दुनिया भर से विद्यार्थी आते थे, पढ़ाई कैसे होती थी।
वहाँ ज्ञान चार स्तरों पर साधा जाता था। शरीर, जिसके लिए अनुशासन और श्रम था। मन, जिसके लिए संयम और स्थिरता का अभ्यास। बुद्धि, जिसके लिए शास्त्रार्थ, यानी खुली बहस, जहाँ गुरु से असहमत होना अपराध नहीं, पद्धति थी। और आत्मा, जिसके लिए सेवा। ध्यान देना, तर्क से बुद्धि पैनी की जाती थी और सेवा से अहंकार काटा जाता था। दोनों साथ-साथ। अकेली पैनी बुद्धि को हमारे पूर्वज खतरा मानते थे।
गुरु वहाँ transactional instructor नहीं था, जिसका काम syllabus पूरा करना हो। वह जीवन का mentor था। विद्यार्थी उसके साथ रहता था, उसे जीते हुए देखता था। क्योंकि चरित्र भाषण से नहीं, सान्निध्य से उतरता है। आज के शब्दों में कहूँ तो शिक्षा residential internship थी, जिसमें subject ज्ञान था और project जीवन।
और सबसे बड़ी बात, विध्वंस की शक्ति देने से पहले रक्षण का विवेक परखा जाता था। अस्त्र उसी को मिलता था जो उसका संयम सिद्ध कर चुका हो। कथाएँ याद करो। परशुराम ने कर्ण से विद्या का दुरुपयोग होते ही उसे वापस ले लिया था। विद्या पात्रता से बंधी थी। आज हम अस्त्र बाँट रहे हैं, संयम का पाठ्यक्रम ही नहीं है। AI से लेकर जैव तकनीक तक, तुम्हारी पीढ़ी के हाथ में जो शक्तियाँ आ रही हैं, वे किसी भी अस्त्र से बड़ी हैं। और पात्रता की परीक्षा कोई नहीं ले रहा।
एक बात और। यह मत सोचना कि वह व्यवस्था केवल पुरोहित गढ़ती थी। तक्षशिला में चिकित्सा पढ़ाई जाती थी, धनुर्वेद पढ़ाया जाता था, वाणिज्य और राजनीति पढ़ाई जाती थी। चाणक्य वहीं के आचार्य थे, और उनका शिष्य चंद्रगुप्त इतिहास का प्रमाण है कि वह शिक्षा कितनी व्यावहारिक थी। अंतर बस यह था कि हर विषय के नीचे चरित्र की नींव अनिवार्य थी। विषय बदलते थे, नींव नहीं।
दो चित्र, जो तुम्हें रास्ता दिखाएँगे
अब दो चित्र देखो, ताकि लगे कि यह सब किताबी बात नहीं है।
पहला चित्र श्रीहरिकोटा का है। देश के सर्वोच्च वैज्ञानिक, चंद्रयान जैसे मिशन के शिल्पी, प्रक्षेपण से पहले मंदिर में शीश झुकाते हैं। कुछ लोग इस पर हँसते हैं। मैं इसमें भारतीय मन का सबसे सुंदर संतुलन देखता हूँ। शिखर का कौशल और शिखर की विनम्रता, एक ही व्यक्ति में। rocket भी, प्रणाम भी। विज्ञान अहंकार से नहीं, विनय से बड़ा होता है। ISRO इसका जीवंत प्रमाण है कि आधुनिकता और परंपरा विरोधी नहीं हैं।
दूसरा चित्र उन विद्यालयों का है जहाँ आधुनिक पाठ्यक्रम के साथ योग, संगीत और मूल्य सह-पाठ्यक्रम नहीं, पाठ्यक्रम का अंग हैं। जहाँ बच्चे coding और संस्कृत साथ पढ़ते हैं। ऐसे प्रयोग देश में हो रहे हैं, विद्या भारती से लेकर कई नवाचारी विद्यालयों तक। इनसे निकला विद्यार्थी सिर्फ किसी corporation की सेवा नहीं करता, राष्ट्र की करता है। कौशल को जब संस्कार दिशा देता है, तब वही चाकू शल्य चिकित्सक का औज़ार बन जाता है।
चार भूख, जिन्हें पहचानना तुम्हारा काम है
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन पढ़ना कभी। वे कहते हैं कि मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समुच्चय है, और चारों की अपनी भूख है।
तुम्हारा package शरीर की भूख मिटाएगा। तुम्हारी engineering मन और बुद्धि को व्यस्त रखेगी। पर एक दिन, शायद तीस की उम्र के आसपास, एक चौथी भूख जागेगी। यह प्रश्न कि इस सबका अर्थ क्या है। मैं किसके काम आ रहा हूँ। उस दिन घबराना मत। वह आत्मा की भूख है। दुनिया उसे mid-life crisis कहती है। हमारी परंपरा उसे जागरण कहती है। जिनके पास विद्या होती है, वे उस दिन दिशा पा जाते हैं। जिनके पास केवल साक्षरता होती है, वे उस दिन खाली हाथ खड़े मिलते हैं, ऊँचे package के साथ।
और एक सूत्र याद रखना। व्यष्टि से समष्टि। तुम अकेली इकाई नहीं हो। तुम परिवार का, समाज का, सृष्टि का अंग हो। तुम्हारा ज्ञान जितने बड़े वृत्त के काम आएगा, तुम्हारा जीवन उतना बड़ा होगा।
NEP 2020: एक द्वार खुला है
एक शुभ समाचार भी दूँ। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने दशकों में पहली बार इस भाषा को नीति में जगह दी है। समग्र विकास, मातृभाषा, भारतीय ज्ञान परंपरा, रटने की जगह चिंतन, कौशल के साथ मूल्य। दिशा सही है।
पर नीति कागज़ होती है, शिक्षा कक्षा में घटती है। लाखों शिक्षकों को इस दृष्टि में दीक्षित करना, परीक्षा प्रणाली को अंकों की दौड़ से चरित्र के आकलन तक ले जाना, और सबसे कठिन, अभिभावकों की उस मानसिकता को बदलना जो आज भी बच्चे का मूल्य percentile में गिनती है। यह एक पीढ़ी का काम है। तुम्हारी पीढ़ी का।
अंत में, तीन काम
पत्र लंबा हो गया। समेटता हूँ। तुमसे तीन काम माँगता हूँ।
पहला, हर वर्ष कम से कम एक ग्रंथ अपनी परंपरा का पढ़ना। गीता से शुरू करो। syllabus के लिए नहीं, स्वयं के लिए।
दूसरा, हर सप्ताह कुछ घंटे ऐसे काम को देना जिसका कोई invoice न बने। सेवा। वही अहंकार की कैंची है, और वही तुम्हें उस समाज से जोड़े रखेगी जिसके परिश्रम से तुम्हारी शिक्षा संभव हुई।
तीसरा, जब तुम्हारे हाथ में शक्ति आए, और आएगी, तो निर्णय से पहले स्वयं से एक प्रश्न पूछना। इससे पंक्ति के अंतिम व्यक्ति का क्या होगा? यही अंत्योदय है। यही तुम्हारी शिक्षा की अंतिम परीक्षा होगी, और वह परीक्षा जीवन भर चलेगी।
आधुनिक बनो, बेटा। पूरी शक्ति से बनो। बस पश्चिम की छायाप्रति मत बनना। तुम्हारे भीतर तक्षशिला भी बैठी है। उसे बोलने देना।
आशीर्वाद सहित, तुम्हारा शुभचिंतक
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