यह कहानी एक पापड़ से शुरू होती है।

15 मार्च 1959। मुंबई के गिरगाँव की एक छत। सात महिलाएँ। हाथ में बेलन, और उधार के अस्सी रुपये। कोई investor नहीं, कोई business plan नहीं, कोई MBA नहीं। बस एक तय की हुई बात। जो भी कमाएँगे, बराबर बाँटेंगे। जो भी घाटा होगा, बराबर उठाएँगे। कोई मालिक नहीं होगी, क्योंकि सब मालकिन होंगी। हर सदस्य एक दूसरे की बेन, यानी बहन।

उस छत पर उस सुबह सिर्फ पापड़ नहीं बेला गया। एक अर्थदर्शन बेला गया। आज उस संस्था में हज़ारों महिलाएँ सह-स्वामिनी हैं, और लिज्जत का नाम घर-घर में है। और उन सात महिलाओं ने वह कर दिखाया जो बीसवीं सदी की दो महाशक्तिशाली विचारधाराएँ नहीं कर पाईं। उन्होंने पूँजी और श्रम की लड़ाई ही समाप्त कर दी। क्योंकि जहाँ श्रम करने वाली ही पूँजी की मालकिन हो, वहाँ लड़ाई किससे?

यह लेख इसी तीसरे रास्ते की बात है। सहकार। जो न पूंजीवाद है, न साम्यवाद, और मेरा तर्क है कि जो भारत की चिति के सबसे निकट का अर्थतंत्र है।

दो आयातित छोर, और बीच का भारत

बीसवीं सदी का वैश्विक विमर्श दो छोरों में बँटा रहा। एक ओर पूंजीवाद, जहाँ लोभ को विकास का इंजन माना गया और मुट्ठी भर हाथों में धन का संचय प्रगति कहलाया। दूसरी ओर साम्यवाद, जहाँ समानता के नाम पर राज्य की मशीन ने व्यक्ति के उद्यम को ही कुचल दिया। एक में बाज़ार मनुष्य पर सवार है, दूसरे में राज्य। दोनों में मनुष्य नीचे है।

दीनदयाल उपाध्याय जी ने इस binary की जड़ पकड़ी थी। दोनों विचारधाराएँ मनुष्य को टुकड़ों में देखती हैं। पूंजीवाद उसे आर्थिक इकाई मानता है, साम्यवाद राजनीतिक इकाई। और दोनों की नींव में संघर्ष है। वर्ग का वर्ग से, पूँजी का श्रम से। भारतीय दृष्टि की नींव में संघर्ष नहीं, सामंजस्य है। और सहकारिता उसी सामंजस्य का आर्थिक रूप है। परिवार की भावना का समुदाय तक विस्तार।

सहकारी ढाँचे का मूल सूत्र तीन पंक्तियों में समझिए। उपभोक्ता ही स्वामी है। उत्पादक ही प्रबंधक है। और श्रम से बना अधिशेष दूर बैठे shareholders या फूली हुई नौकरशाही के पास नहीं, उन्हीं हाथों में लौटता है जिन्होंने उसे बनाया। यही अंत्योदय का अर्थतंत्र है। पंक्ति के अंतिम व्यक्ति को लाभार्थी नहीं, हिस्सेदार बनाना।

श्रेणियाँ: सहकार का प्राचीन संविधान

और यह विचार Rochdale से आयात नहीं हुआ। इसकी वंशावली हमारे अपने इतिहास में है।

प्राचीन भारत की श्रेणियाँ, यानी guilds, संसार की सबसे परिष्कृत सहकारी संस्थाओं में थीं। मौर्य और गुप्त काल में श्रेणियाँ उत्पादन से लेकर बैंकिंग तक चलाती थीं। लोग अपनी जमा-पूँजी श्रेणियों के पास रखते थे, और शिलालेख गवाह हैं कि मंदिरों और नगरों के स्थायी दान की व्यवस्था श्रेणियों के ब्याज से चलती थी। राज्य का हस्तक्षेप न्यूनतम था, पर धर्म का अनुशासन पूर्ण। श्रेणी के भीतर संबंध मालिक-नौकर का नहीं, गुरु-शिष्य और कुटुंब का था। कौशल पीढ़ियों में बहता था, जोखिम सामूहिक था, और लक्ष्य केवल अर्थ नहीं, सामाजिक व्यवस्था का पोषण था।

गाँव की साझा व्यवस्थाएँ भी यही थीं। जल, चरागाह, वन। साझे संसाधन, साझा प्रबंधन, साझी जवाबदेही। जिसे पश्चिम आज Stakeholder Capitalism कहकर खोज रहा है, वह हमारे गाँव का सामान्य बोध था। अर्थ नीति पर नहीं, नीति अर्थ पर शासन करती थी।

अमूल: किसान ही पूँजीपति

अब इस परंपरा का आधुनिक शिखर देखिए। आनंद, गुजरात।

1946 में खेड़ा के दूध उत्पादक किसान बिचौलियों के शोषण से त्रस्त थे। सरदार पटेल के मार्गदर्शन और त्रिभुवनदास पटेल के नेतृत्व में उन्होंने अपनी सहकारी समिति बनाई। फिर डॉ. वर्गीज़ कुरियन का प्रबंधन जुड़ा, और वह हुआ जिसे दुनिया श्वेत क्रांति कहती है। आज अमूल करोड़ों किसान परिवारों की साझी संपत्ति है, देश का सबसे बड़ा खाद्य brand है, और उसका वार्षिक कारोबार हज़ारों करोड़ में है।

पर आँकड़ों से बड़ी बात उसका ढाँचा है। अमूल ने पश्चिम की उस मान्यता को ध्वस्त कर दिया कि बड़े व्यवसाय के लिए बड़ा पूँजीपति चाहिए। यहाँ किसान ही पूँजीपति है। सुबह दूध डालने वाली गुजरात की वह महिला उसी brand की स्वामिनी है जिसका विज्ञापन विश्व कप में चलता है। पूँजी और श्रम का संघर्ष यहाँ सुलझाया नहीं गया। यहाँ वह पैदा ही नहीं होता। और स्मरण रहे, 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट में जब पश्चिम के दिग्गज बैंक ढह रहे थे, दुनिया भर की सहकारी बैंकिंग अपेक्षाकृत स्थिर खड़ी रही। जिस ढाँचे में लोभ की जगह सदस्य का हित केंद्र में हो, वह संकट में भी कम काँपता है।

फिर ठहराव क्यों आया

तो प्रश्न उठता है। जिस देश के पास श्रेणियों की विरासत, अमूल और लिज्जत जैसे प्रमाण हों, वहाँ सहकारिता आंदोलन बड़ी सीमा तक ठहरा हुआ क्यों दिखता है? हर राज्य में अमूल क्यों नहीं?

उत्तर कड़वा है। हमने सहकार की आत्मा को नौकरशाही और राजनीति के हवाले कर दिया। स्वतंत्रता के बाद की नीति-दृष्टि ने, जो Fabian समाजवाद से प्रभावित थी, सहकारी संस्थाओं को स्वायत्त धार्मिक उद्यम की जगह सरकारी तंत्र का विस्तार बना दिया। registrar की अनुमति के बिना पत्ता न हिले। फिर राजनीति घुसी। सहकारी समितियों के चुनाव सत्ता की सीढ़ी बन गए, बोर्ड जागीरें बन गए, और ऋण समितियाँ घोटालों की खबरें। जिस संस्था का ईंधन विश्वास था, उसमें हमने अविश्वास भर दिया।

चूक concept की नहीं, चरित्र की थी। हमने भारतीय संस्था को आयातित सीमेंट से बनाना चाहा। अमूल और लिज्जत इसीलिए बचे रहे क्योंकि वहाँ स्वायत्तता भी थी और संस्कार भी। सदस्य के मन में यह भाव कि संस्था मेरी है, और प्रबंधन में यह अनुशासन कि संस्था सेवा है, दुकान नहीं।

एकात्म मानव दर्शन: विकेंद्रित अर्थ का दर्शन

एकात्म मानव दर्शन इस पूरे अनुभव को सूत्रबद्ध करता है। दीनदयाल जी का अर्थचिंतन तीन स्तंभों पर खड़ा है। पहला, अर्थ का अभाव भी अनर्थ, अर्थ का प्रभाव भी अनर्थ। यानी व्यवस्था ऐसी हो जो दरिद्रता भी मिटाए और धन के केंद्रीकरण को भी रोके। सहकारिता ठीक यही करती है। दूसरा, विकेंद्रीकरण। अर्थव्यवस्था का गुरुत्व केंद्र स्थानीय समुदाय हो। जन-जन द्वारा उत्पादन, केवल जन के लिए mass production नहीं। तीसरा, व्यष्टि और समष्टि का सेतु। आर्थिक गतिविधि समाज के ताने-बाने को मजबूत करे, वर्ग-वैमनस्य से उधेड़े नहीं।

इन तीनों कसौटियों पर सहकारी मॉडल जितना खरा उतरता है, उतना कोई नहीं। इसीलिए कहा जा सकता है कि सहकार एकात्म मानव दर्शन का चलता-फिरता प्रयोग है। आनंद की डेयरी में दर्शनशास्त्र दूध बनकर बहता है।

नीति की दिशा: सहकार से समृद्धि, शर्तों के साथ

केंद्र में अलग सहकारिता मंत्रालय का गठन और सहकार से समृद्धि का संकल्प सही दिशा में बड़े कदम हैं। PACS का आधुनिकीकरण, नई बहुराज्यीय समितियाँ, बीज से लेकर जैविक उत्पादों और निर्यात तक सहकारी ढाँचे। अवसर ऐतिहासिक है। पर चार शर्तें पूरी हों, तभी यह अवसर आंदोलन बनेगा।

पहली, राजनीति से दूरी। सहकारी संस्थाओं के चुनाव और प्रबंधन को दलगत राजनीति से जितना बचाया जाएगा, संस्था उतनी जिएगी। स्वायत्तता सहकार की साँस है।

दूसरी, संस्कार का पाठ्यक्रम। हर नई समिति के सदस्य-प्रशिक्षण में बही-खाते के साथ सहकार का दर्शन भी पढ़ाया जाए। अमूल की सफलता का आधा रहस्य किसान का यह भाव है कि यह मेरा है। वह भाव योजना से नहीं, दीक्षा से आता है।

तीसरी, पेशेवर प्रबंधन। कुरियन मॉडल की कुंजी यही थी। स्वामित्व किसान का, प्रबंधन professional का, और दोनों के बीच विश्वास। नई पीढ़ी के प्रतिभाशाली युवाओं के लिए सहकारी क्षेत्र आकर्षक career बने।

चौथी, नए क्षेत्रों में विस्तार। platform अर्थव्यवस्था के इस युग में delivery workers, gig कामगारों, कारीगरों और छोटे दुकानदारों की सहकारी समितियाँ ही बिचौलिया-प्रधान apps का भारतीय उत्तर हो सकती हैं। जिस तरह दूध में बिचौलिया हटा, उसी तरह डिजिटल बाज़ार में हट सकता है। सहकार 2.0 यहीं है।

निष्कर्ष: छत से राष्ट्र तक

उस छत पर लौटिए। सात महिलाएँ, अस्सी रुपये, और बराबरी का एक वचन। न किसी का शोषण, न किसी से घृणा। न पूँजी की पूजा, न पूँजी का नाश। बस साझा श्रम, साझा स्वामित्व, साझा प्रसाद।

दुनिया आज असमानता के ज्वालामुखी पर बैठी पूछ रही है कि पूंजीवाद के बाद क्या। उत्तर के लिए उसे New York या Beijing नहीं, आनंद और गिरगाँव देखना चाहिए। भारत के पास तीसरा रास्ता सिद्धांत में ही नहीं, turnover में भी सिद्ध है।

पूँजी और श्रम की लड़ाई प्रकृति का नियम नहीं है। वह एक आयातित मान्यता है। और उसका सबसे स्वादिष्ट खंडन आज भी हर भारतीय रसोई में कुरकुराता है। एक पापड़, जिसे बेलने वाली ही उसकी मालकिन है।